पीडीडीयू नगर। जब तक मानव का मन सत्व, रज और तमोगुण के वश में रहता है, वह बिना किसी अंकुश के अपनी ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों से शुभ कार्य करता है। जब उसका मन वासना व अन्य दुर्गुणों के वश में हो जाता है तो वह शुभ कर्मों से भटक जाता है।
यह विचार नगर के पराहुपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शुक्रवार को कथावाचक पं. सुरेंद्रनाथ तिवारी ने व्यक्त किये। कहा कि विषय से आसक्त मन जीव को सांसारिक संकट में डाल देता है। प्रह्लाद की कथा का वर्णन कराते हुए कहा, कश्यप ऋषि की पत्नी का नाम दिति था। उनके दो पुत्रों में एक हिरण्यकश्यपु के पुत्र प्रह्लाद थे। छोटी उम्र में ही प्रह्लाद भगवान विष्णु के भक्त हो गए थे। इससे उनके पिता उनसे रुष्ट रहते थे। शिक्षा ग्रहण करने के बाद घर लौटे पुत्र प्रह्लाद से जब उनके पिता ने जानना चाहा कि उन्होंने क्या शिक्षा ग्रहण की है तो प्रह्लाद ने विष्णु का गुणगान करना आरंभ कर दिया। इससे क्रोधित विष्णु को अपना दुश्मन मानने वाले प्रह्लाद के पिता ने उन्हें खंभे से बंधवा दिया। इसी खंभे से निकलकर श्री हरि ने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और हिरण्यकश्यपु का वध किया। इस मौके पर प्रफुल्ल प्रसाद, डब्बू यादव, संजय पाठक, संतोष तिवारी आदि उपस्थित थे।