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गांव वाले भी करते थे ओमप्रकाश के जज्बे को सलाम

Mon, 18 Apr 2016 11:42 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बुलंदशहर
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ओमप्रकाश का फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला
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मेरठ स्थित बाल संप्रेक्षण गृह में बवाली किशोरों के हमले में शहीद हुए सिपाही ओमप्रकाश के गांव नगला फजलपुर के लोग भी उनके जज्बे को सलाम करते हैं। उनका कहना है कि ओमप्रकाश हर किसी की जरूरत में उनके साथ खड़े रहने के लिए तैयार रहते थे।
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उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए जब ओमप्रकाश की पत्नी को राजभवन लखनऊ बुलाया गया तो गांव और परिवार के लोग खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। हांलाकि, अपने बिछुड़े साथी को मिल रहे सम्मान से जहां उन्हें खुशी है वहीं, परिवार की आर्थिक मदद के लिए शासन की तरफ से कोई सहायता न मिलने को लेकर मलाल भी है।

बता दें कि नगला फजलपुर गांव निवासी 55 वर्षीय ओमप्रकाश मेरठ स्थित पुलिस लाइन में तैनात थे। मेरठ के सूरजकुंड स्थित बाल संप्रेक्षण गृह में बवाली किशोरों ने पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी थी। ओमप्रकाश की पत्नी निहाल देवी को राजभवन में राज्यपाल द्वारा सोमवार को सम्मानित किया गया।
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गांव के  होती लाल, टूकीराम बताते हैं कि ओमप्रकाश शुरू से ही होनहार और संकट में सबका साथ देने वाला रहा। गांव में किसी से उसका कोई मतभेद नहीं था, सभी उससे प्यार करते थे। चचेरे भाई बलवीर बताते हैं कि मौत के बाद से ओमप्रकाश के परिवार की आर्थिक स्थित ठीक नहीं है।

दो बीघा खेती के बलपर परिवार का गुजर बसर चल रहा है। बड़ा बेटा हेमंत प्रकाश पिता की जगह नौकरी पाने के लिए भटक रहा है। गांव के लोगों का कहना है कि सम्मान तो मिला लेकिन आर्थिक मदद के लिए शासन-प्रशासन से कोई नहीं आया।

एकांत को याद कर आज भी नम हो जाती है आंखें
मेरठ में बदमाशों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए कोतवाली क्षेत्र के ग्राम नंगला काला के सिपाही एकांत यादव की पत्नी को सोमवार को राज्यपाल ने राजभवन (लखनऊ) में सम्मानित किया। गांव और परिवार वाले एकांत पर गर्व करते हैं। वहीं, एकांत की पत्नी अंशू को पति की शहादत पर गर्व तो है, लेकिन शासन से कुछ शिकायतें भी हैं। 

कोतवाली क्षेत्र के ग्राम नंगला काला निवासी सिपाही एकांत यादव थाना निसाड़ी गेट मेरठ में तैनात थे। दिसंबर 2014 में नूंहनगर मेरठ में बदमाशों से मुठभेड़ के दौरान वह शहीद हो गए थे। एकांत के पिता सतपाल सिंह यादव भी बीएसएफ में तैनात हैं।

मां शीला देवी गृहणी है। शादी के छह माह बाद ही एकांत की पत्नी अंशू विधवा हो गई थीं। एकांत की शहादत को दो साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी आज वह गांव वालों के दिलों में जिंदा है।
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