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मुंडेर पर नहीं काग, कौन पहुंचाए पितरों को ‘भाग’

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पितृपक्ष - फोटो : ????????
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मुंडेर पर नहीं काग, कौन पहुंचाए पितरों को ‘भाग’
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बुलंदशहर। दस वर्ष पूर्व घर की मुंडेर पर सुबह जब कौआ आकर कांव-कांव करता था तो यह माना जाता था कि घर पर कोई मेहमान आने वाला है। पितृपक्ष में कौआ को भोजन कराना शुभ माना गया है। लोग छतों पर कौआ को खाना खिलाते हैं। माना जाता है कि इससे पितृ प्रसन्न होते हैं, लेकिन अब घर की मुंडेर पर न तो कौआ नजर आते हैं और न ही उनकी कांव-कांव सुनाई देती है। दो दशक से लगातार कौओं की संख्या घट रही है।
पितृपक्ष में पूड़ी और हलवा लेकर लोग कौआ की तलाश करते हैं। मगर पर्यावरणीय बदलाव से जनपद में कौआ की संख्या लगातार घट रही है। वन्यजीव विशेषज्ञ कौआ की घटती संख्या से काफी चिंतित हैं। पर्यावरणविद् राजेंद्र पथिक ने बताया कि कौआ और गिद्ध (अब नहीं दिखाई देते) दोनों ही मृत पशुओं का मांस खाकर पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं। मगर दो दशक से दोनों ही पक्षियों की संख्या में काफी कमी आने लगी। पशुओं के उपचार में दी जाने वाली डाइक्लोफेनिक (अब बंद हो गई) दवाइयां दोनों पक्षियों के लिए घातक सिद्ध हुईं। डाइक्लोफेनिक का प्रभाव मरने के बाद भी पशुओं के शरीर में रहता है। जब कौआ और गिद्ध उन मृत पशुओं का मांस खाते हैं तो उस दवा के प्रभाव से इनकी किडनी फेल हो जाती है। इससे मांस खाने वाले कौआ या गिद्ध की मौत हो जाती है।
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कीटनाशक का इस्तेमाल घातक
जनपद में फसलों में कीटनाशक दवाओं का अधिक प्रयोग किए जाने से कीट-पतंगों में भी कमी हो रही है। कीट-पतंगों के कम होने पर कौओं का भोजन कम हो रहा है। खाना, पानी या अन्य माध्यमों से कीटनाशकों का जहर इनके शरीर में पहुंच रहा है। इससे कौओं की प्रजनन क्षमता कम हो रही है।
बागों में प्लाटिंग ने छीना कौओं का घर
जनपद में दो दशक पूर्व काफी संख्या में बाग हुआ करते थे। बागों में लगे ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर कौआ को घोंसला हुआ करता था। लेकिन जनपद में प्लाटिंग के चलते लगातार बाग कट रहे हैं। ऐसे में कौओं के घोंसले भी नष्ट होते जा रहे हैं।
पितृपक्ष में कौआ को श्रद्धापूर्वक व विनम्रता के साथ भोजन कराने का वर्णन विष्णु पुराण में मिलता है। इसलिए पितृपक्ष के 16 दिनों तक पितरों का स्वरूप मानकर कौआ को भोजन कराया जाता है। - पंडित राज शर्मा, ज्योतिषाचार्य
फसलों में कीटनाशक का अधिक इस्तेमाल हो रहा है। मोबाइल टावर की किरणें भी पक्षियों पर विपरीत असर डाल रही हैं। इन सबके चलते कौआ ही नहीं अन्य पक्षियों की संख्या में भी कमी आ रही है, जबकि कौआ की कोई गणना नहीं होती।
- विनीता सिंह, डीएफओ
आज से शुरू होगा पितरों का श्राद्ध-तर्पण
बुलंदशहर। भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से अश्विन मास की अमावस्या तिथि तक मनाए जाने वाले पितृपक्ष की शुरुआत सोमवार से होगी। वहीं, समापन छह अक्तूबर को होगा। मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध करना शुभ और फलदाई होता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित राज शर्मा ने बताया कि खुशहाल और संपन्न जीवन व्यतीत करने के लिए बेहद आवश्यक है कि पितरों का आशीर्वाद बना रहे। यदि किसी गलती की वजह से पितृ हमसे नाराज हो जाएं तो इससे व्यक्ति के जीवन में पितृदोष जैसा बड़ा दोष लग जाता है। ऐसे में पितृपक्ष का यह समय पितृपक्ष जैसे गंभीर दोष से छुटकारा पाने और पितरों की आत्मा की शांति के लिए बेहद फलदाई बताए गए हैं। पितृपक्ष के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं करें। इसके अलावा दाढ़ी या बाल भी नहीं कटवाने चाहिए। तंबाकू, सिगरेट या शराब का सेवन न करें और पितृपक्ष के दौरान किसी भी पशु या इंसान का अनादर नहीं करना चाहिए।
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50 साल बाद श्राद्ध पक्ष पर बन रहा ग्रहण योग
ज्योतिषाचार्य नरेंद्र शर्मा आचार्य ने बताया कि श्राद्ध पक्ष की शुरूआत चंद्रग्रहण में होगी। इस दौरान सूर्य और राहु की युति होने से 15 दिन तक ग्रहण योग रहेगा। यह ग्रहण देश में न दिखने के कारण कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। इससे पहले 1971 में भी पितृपक्ष की शुरूआत चंद्रग्रहण के साथ हुई थी। ज्योतिषाचार्य नरेंद्र शर्मा ने बताया कि 50 साल बाद गज छाया योग भी बन रहा है। इस योग में श्राद्ध तर्पण पिंडदान करने से पांच गुना अधिक पुण्यफल प्राप्त होता है। श्राद्ध पक्ष में 20 सितंबर से छह अक्टूबर तक अमृत सिद्ध योग बन रहा है। यह दिन पितृ पूजा के लिए विशेष होंगे। छह अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या पर सोमवती का योग बन रहा है। इस दौरान तर्पण पिंडदान करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।
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