गंगा किनारे बसे गांवों का गंदा पानी अब तालाब में जाएगा। हैंडपंपों के पास सोखता गड्ढे बनाए जाएंगे। गांवों का कचरा गड्ढे में एकत्रित होगा और कचरे से खाद बनेगी जबकि शेष कचरे को नष्ट किया जाएगा। इस कार्य के लिए गंगा किनारे सात गांवों में ठोस व तरल अपशिष्ट प्रबंधन विकसित किया जाएगा।
बता दें कि नमामि गंगे योजना के तहत गंगा को निर्मल और स्वच्छ बनाने की दिशा में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसी क्रम में अब पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय भारत सरकार, जल संसाधन नदी विकास व गंगा संरक्षण मंत्रालय ने पहल की है कि गंगा किनारे बसें गांवों का गंदा पानी और कचरा गंगा में जाने से रोका जाए।
इस कार्य के लिए केंद्र सरकार ने जिला पंचायत अधिकारी को कार्ययोजना का पत्र प्राप्त हो गया है। जिस पर डीपीआरओ ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है। खास बात यह है कि इस कार्य में आमजन का भी सहयोग लिया जाएगा। यह कार्य पंजाब के जालंधर जिले के गांव सींचवाल में की गई नदी की सफाई से प्रेरणा लेकर किया जा रहा है।
इन गांवों को किया चिन्हित
पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय भारत सरकार, जल संसाधन नदी विकास व गंगा संरक्षण मंत्रालय ने गंगा किनारे बसे सिरोरा बांगर, बच्चीखेड़ा, बसी बांगर, फरीदा बागर, निजानपुर बांगर, निवाड़ी बांगर और निजामपुर बांगर को ठोस व तरल अपशिष्ट प्रबंधन विकसित करने के लिए चिह्नित किया है।
बिन एनओसी नहीं चलेंगे ईंट-भट्ठे
जिले के ईंट भट्ठे पर्यावरण की नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) के बिना नहीं चल पाएंगे। राहत की खबर यह है कोर्ट ने एनओसी जारी करने की जिम्मेदारी डीएम को दी है। ऐसे में एनओसी के लिए व्यापारियों को लखनऊ की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी।
जिले में पंजीकृत ईंट भट्ठे 340 हैं। ईंट भट्ठों की चिमनियों से निकला जहरीला धुआं पर्यावरण की सेहत तो बिगाड़ ही रहा है, साथ ही इसका असर आम आदमी के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। जगह जगह अवैध रूप से मिटटी खुदाई होने से भी पर्यावरण में डिस बैलेंस बन रहा है।
इसी असमानता को रोकने के लिए कई विभागों से एनओसी लेने की व्यवस्था की गई है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पावर कारपोरेशन, वाणिज्य कर राजस्व समेत कई विभागों की रिपोर्ट मांगी जाती है। रिपोर्ट के आधार पर डीएम को एनओसी जारी करना पड़ेगी।