दोनों के बनाए हुए दीये जनपद के अलावा गाजियाबाद, हापुड़ और मेरठ तक बिक्री के लिए जाते हैं। वहीं, सराय काजी निवासी नसीम ने बताया कि उसके मायके में यह काम होता था, शादी के बाद पति के कहने पर उसने यह काम शुरू किया था। करीब पांच वर्ष पूर्व पति की मौत हो जाने के बाद अब यही उनके गुजर बसर का साधन है।
नसीम ने बताया कि पति की मौत के बाद आठ बच्चों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई। धीरे-धीरे उसने अपनी इस कारीगरी की बदौलत अपनी तीन लड़कियों और दो बेटों की शादी कर दी है। अभी दो बेटों और एक बेटी की शादी करनी बाकी है। नसीम ने बताया कि वह हाथ के चाक से काम करती है और घर में जगह नहीं होने पर किराये के स्थान पर दीये बनाती है।
रोजाना वह 800 से 1000 तक दीये बना लेती है। वह अपने दीये गाजियाबाद में थोक के भाव में बेच देतीं हैं। वर्तमान में दीये बनाने में काफी खर्च हो रहा है। साथ ही दीये बनाने के लिए मिट्टी भी काफी मुश्किल से मिलती है। बावजूद इसके वह दीये बनाने का काम नहीं छोड़ना चाहती है। उनका कहना है कि इस काम से पति के जाने के बाद पूरे परिवार को पाला है। इसके अलावा कुछ आता भी नहीं है।