उत्तर प्रदेश में सदानीरा के नाम से जानी जाने वाली बदायूं की सोत नदी हजारों किसानों के लिए जीवनदायिनी रही है। आस-पास के दर्जनों गांवों में इसे मोक्षदायिनी के रूप में पूजा जाता है। यहां के लोगों के बीच नदी किनारे मृत शरीर की अंत्येष्टि करने की परंपरा आज भी कायम है, लेकिन बीतते समय के साथ जैसे-जैसे नदी सूखती गई वैसे-वैसे लोगों ने नदी के बहने वाली जगह पर ही अंत्येष्टि करना शुरू कर दिया।
इसके बाद से नदी और किनारे के इलाकों में गंदगी फैलनी शुरू हो गई। देखते ही देखते चारों ओर गंदगी का अंबार लग गया। आलम यह है कि एक तरफ नदी का पानी सूखता जा रहा है और दूसरी ओर लोग अपने पैर फैलाते ही जा रहे हैं। अब तो ग्रमीण नदी के बीच में ही अंत्येष्टी करने के लिए पहुंच जाते हैं।
केवल नीजरा गांव के लोग साहनपुर स्थित शवदाहगृह में शवों की अंत्येष्टि करते हैं। उनके अलावा रूपपुरा, पस्तोर, करकटपुर, गोठा, जखौलिया, धौरेरा, धर्मपुर नगरिया आदि गांवों के कई लोग इस काम के लिए नदी किनारे आते हैं। रानैट ग्राम में तो श्मशान भूमि होने के बावजूद भी काफी लोग नदी के बीचोंबीच अंतिम संस्कार करते हैं।
अधिक संख्या में अंत्येष्टि होने की वजह से नदी में भीषण गंदगी व्याप्त है। नदी की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। एक समय यहां के किसान खेती के लिए जिस नदी पर आश्रित रहते थे, अब उसके पानी का प्रयोग सिचाई के लिए भी नहीं कर पाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि मृत्यु के बाद नदी किनारे अंत्येष्टि करना मृतक की मोक्ष प्राप्ति के लिए काफी शुभ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते सैकड़ों वर्षों से सोत नदी किनारे नगर समेत दर्जनों गांव में शवों की अंत्येष्टि की जाती है।
बिसौली गांव के रहने वाले घनश्याम माहेश्वरी कहते हैं कि क्षेत्र की शान सोत नदी के प्रति शासन व प्रशासन की उदासीनता समझ के परे है। नदी के पुनर्जीवन के लिए सरकार को नींद से जागने की सख्त जरूरत है। वहीं जखौलिया प्रदीप चौहान ने सोत नदी को बचाने की सलाह देते हुए कहा कि या तो इसे किसी नहर से जोड़ देना चाहिए या फिर खुदाई द्वारा इसके बंद स्रोत खोलने का प्रयास होना चाहिए, तभी यह जीवित हो सकती है।