कादरचौक। ककोड़ा मेला की तैयारियां जोरों पर हैं। शुक्रवार को ट्रकों से मेला क्षेत्र में झूला, टोरा टोरा, ड्रेगन, नाव, ब्रेक डांस, स्लंबो, काला जादू जैसे आकर्षक खेल तमाशों की सामग्री मेला स्थल पर पहुंच गई। अभी लाइट का काम शुरू नहीं होने से मेला क्षेत्र में अंधेरा पसरा हुआ है। बता दें कि मेले में सप्तमी तिथि को ककोड़ा देवी मंदिर से देवी स्वरूप झंडी भी पहुंचने वाली है, जिससे तैयारियों में और तेजी आई है।
मेला स्थल में जंगल जैसी स्थिति है। सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था न होने से चिंता की स्थिति बनी हुई है। पुलिस पिकेट भी अभी तक नहीं लगी है। सुरक्षा की जिम्मेदारी कासगंज के सिकंदरपुर वैश्य थाना के अंतर्गत है।
मेले की तैयारियों के चलते आसपास के खेतों में खड़ी गन्ने की फसल काटी जा रही है। मेला स्थल तक पहुंचने के लिए अस्थायी सड़कें बन चुकी हैं। मेले में सप्तमी तिथि को ककोड़ा देवी मंदिर से देवी स्वरूप झंडी भी पहुंचने वाली है, जिससे तैयारियों में और तेजी आई है।
मेले के ठेकेदार सुधीर यादव, मधुरेश गुप्ता और रामसिंह मेला व्यवस्था पूरी कराने में जुटे हैं। उन्होंने अस्थायी सड़क बनाने वाले मजदूरों को समय पर काम पूरा करने की जानकारी दी ताकि मेला आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो। इस समय मेला स्थल पर कार्य तीव्र गति से चल रहा है।
नक्शे के अनुसार, श्रद्धालुओं के डेरे और तंबू लगाए जाएंगे। हालांकि, अभी वहां किसान अपनी गन्ने की फसल को काट रहे हैं। किसानों ने ट्रैक्टर-ट्रॉली में गन्ना भरकर नजदीकी कोल्हू में डालना शुरू कर दिया है। मेला स्थल के लिए करीब सौ हेक्टेयर जमीन खाली कराई जा रही है। मेलाकर्मी और स्थानीय प्रशासन इस काम में पूरी तत्परता दिखा रहे हैं ताकि मेला समय पर और सुचारू रूप से आयोजित हो सके।
मेले में अब नहीं होती घुड़दौड़
कभी मेले का मुख्य आकर्षण रही घुड़दौड़ प्रतियोगिता और पशु नखासा अब इतिहास बन चुके हैं। पशुपालन विभाग ने ग्लैंडर्स (संक्रामक बीमारी) का हवाला देकर कुछ वर्ष पूर्व घुड़दौड़ स्थायी रूप से बंद कर दी थी। पहले मेला के दौरान सैकड़ों पशुओं की खरीद-फरोख्त होती थी, जिससे राजस्व की अच्छी आमद होती थी।
मेले में अब मनोरंजन के नाम पर सिर्फ जिला पंचायत का एक सांस्कृतिक पंडाल ही बचा है। पहले जहां एक नहीं, बल्कि कई लोककला और नाट्यशाला मंच सजते थे, वहीं अब इनकी अनुमति तक नहीं दी जाती।
अंग्रेजी शासन की धरोहर बन रहा खंडहर
इतिहास की बात करें तो क्षेत्रीय जानकार बताते है कि 1937 में अंग्रेजों ने कादरचौक थाने के सामने मेला गोदाम बनवाया था। उस समय डिस्ट्रिक बोर्ड के चेयरमैन चौधरी बदन सिंह थे। गोदाम के चार बड़े हाल मेले के टेंट, लोहे के पटरे और आवश्यक सामग्री से भरे रहते थे। अब यह भवन खंडहर में बदल चुका है। पहले कादरचौक से मेले तक कच्चा रास्ता था, जिस पर सुतिया पुलिया बनती थी। पुलिया पार करने पर मेला टैक्स लिया जाता था, जो अब बंद है। अब गोदाम में केवल हवालात शेष रह गई