बदायूं। सदर विधानसभा सीट पर रोमांचक मुकाबले के आसार बन गए हैं। चुनाव का रुख काफी हद तक एक लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटरों के झुकाव पर निर्भर करेगा। उनके बंटने पर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है वर्ना आमने सामने की जबर्दस्त टक्कर के आसार हैं। दो पार्टियों के बागियों की सक्रियता चुनावी समीकरण बनाने बिगाड़ने का काम करेगी। भाजपा के शीर्ष नेता जिले में आकर ध्रुवीकरण को धार देने वाले तीखे बयान दे भी चुके हैं।
सदर सीट पर भाजपा से महेश चंद्र गुप्ता उम्मीदवार हैं जो प्रदेश के नगर विकास राज्यमंत्री भी हैं। भाजपा की दावेदारी के लिए पार्टी के पास थोक में नाम थे पर दोबारा महेश गुप्ता की दावेदारी पर मोहर लगने के बाद बाकी खामोश हो गए। इनमें से कुछ प्रत्याशी की सक्रिय रूप से मदद करते दिख रहे हैं तो बाकी घरों में बैठे हैं। सपा से काजी रिजवान का टिकट फाइनल होने के बाद कट गया तो वह घर बैठ गए हैं। पिछले दिनों पूर्व सांसद से सार्वजनिक तौर पर उनका नाराजगी जताने वाला वीडियो वायरल हुआ था। सपा से टिकट के दूसरे प्रबल दावेदार वक्फ विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष आबिद रजा सार्वजनिक तौर पर सपा प्रत्याशी की मुखालफत कर रहे हैं और समर्थकों से बसपा व भाजपा में से किसी को चुनने की बात कर रहे हैं। हालांकि सपा प्रत्याशी रईस अहमद हाईटेक प्रचार के दम पर सर्मथकों व जनता को साधने में जुटे हैं और प्रयास में हैं कि विरोधियों की दाल न गलने दें। मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में करने में वह कामयाब हुए तो चमत्कार संभव है।
बसपा प्रत्याशी राजेश कुमार सिंह का टिकट सबसे पहले घोषित हुआ था। वह खामोशी से लंबे समय से अपने प्रचार में जुटे हैं और सजातीय, कैडर वोट के साथ ही दूसरे वर्गों का वोट पाने की उम्मीद में हैं। अगर आबिद की अपील का असर हुआ तो मुस्लिम वोटर राजेश की झोली भी भर सकते हैं। भाजपा प्रत्याशी का कई मुस्लिम इलाकों में हो रहा स्वागत भी चौंकाने वाली बात है। कुल मिलाकर सारी गोलबंदी मुस्लिम वोटों के इर्दगिर्द ही होती दिख रही है। कांग्रेस की युवा प्रत्याशी रजनी सिंह भी जबर्दस्त तरीके से प्रचार में जुटी हैं। वह कांग्रेस के बेस वोट के अलावा युवाओं, सवर्ण वोटरों को जीत का आधार मानती हैं। खुद महिला होने के नाते उन्हें महिलाओं के वोट मिलने का भी यकीन है। इनके अलावा वंचित समाज पार्टी के उस्मान गद्दी, भारतीय सुभाष सेना से नंदराम, निर्दलीय हेमसिंह भी चुनावी मैदान में हैं और जीत के दावे ठोंक रहे हैं।
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बदायूं सदर का जातिगत आंकड़ा
मतदाता- 375370
पुरुष मतदाता- 193514
महिला मतदाता- 181856
जातिगत मतदाता
दलित- 70 हजार
मुस्लिम - 1.10 लाख
यादव - 15 हजार
क्षत्रिय - 17 हजार
वैश्य- 35 हजार
साहू- 15 हजार
ब्राह्मण- 15 हजार
मौर्य शाक्य- 35 हजार
कुर्मी- 20 हजार
कश्यप- 16 हजार
अन्य 27 हजार
(सभी आंकड़े लगभग में हैं)
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प्रमुख मुद्दे
शहर में टूटी सड़कें
चोक नालों की वजह से जलभराव
शहर में पार्किंग की समस्या, जाम का झाम
शहर में घूमते छुट्टा पशु, देहात में फसलों की बर्बादी
इंजीनियरिंग कॉलेज न होना, मेडिकल कॉलेज में सुविधाओं की कमी
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तीस साल से हो रही भाजपा-सपा की टक्कर, हर बार विधायक बदलती है जनता
शहर विधानसभा सीट पर करीब 30 साल से भाजपा और सपा के बीच कांटे की टक्कर हो रही है। 1993 के उप चुनाव में इस सीट पर पहली बार सपा के जोगेंद्र सिंह अनेजा ने भाजपा के कृष्ण स्वरूप वैश्य को मात्र सात सौ वोट से हराकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद से ज्यादातर मुख्य मुकाबला सपा और भाजपा के बीच हो रहा है। हालांकि, 2002 के चुनाव में बसपा के टिकट पर विमल कृष्ण अग्रवाल ने जीत दर्ज की थी, बाद में वह सपा में शामिल हो गए थे।
शहर सीट पर 1985 के बाद कांग्रेस कभी जीत दर्ज नहीं कर सकी। प्रमिला भदवार मेहरा कांग्रेस से विधायक चुनी गई थीं। इसके बाद 1989 और 91 में लगातार भाजपा के कृष्ण स्वरूप वैश्य विधायक चुने गए। 1993 के उप चुनाव में सपा के जोगेंद्र सिंह अनेजा ने उनको करा दिया। 1996 के सामान्य निर्वाचन में भाजपा के प्रेमस्वरूप पाठक ने जोगेंद्र सिंह को हराकर सीट पर कब्जा कर लिया। 2002 का चुनाव बसपा से जीतने वाले विमल कृष्ण अग्रवाल ने 2007 का चुनाव सपा से लड़ा। इस बार भाजपा के महेश गुप्ता बड़े अंतर से विधायक चुने गए। वर्ष 2012 के चुनाव में सपा के आबिद रजा ने महेश गुप्ता को पराजित कर सीट पर कब्जा कर लिया। इसके बाद 2017 के चुनाव में फिर से महेश गुप्ता और आबिद रजा में टक्कर हुई। इस बार महेश गुप्ता ने आबिद रजा को हरा दिया। कुल मिलाकर सदर सीट की जनता हर चुनाव में विधायक बदलती रही है। इस बार रिकार्ड टूटेगा या नहीं, दस मार्च को पता लगेगा।
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परिसीमन से बदला भूगोल, बिनावर विधानसभा के गांव भी जुड़े
वर्ष 2012 के चुनाव से बदले हुए भौगोलिक परिदृश्य में चुनाव हो रहा है। दरअसल, 2012 में बिनावर विधानसभा को खत्म कर उसका करीब 80 फीसदी हिस्सा बदायूं और शेष शेखूपुर में शामिल कर दिया है। बिनावर कस्बा समेत कई गांव सदर सीट में हैं। पहले उझानी व कछला सदर सीट में शामिल थे। अब वह बिल्सी सीट का हिस्सा है। वहीं वजीरगंज क्षेत्र अब सदर में शामिल हो गया है।
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वोटर भी मानते हैं, जाति-धर्म का फैक्टर चल ही जाता है
सदर विधानसभा क्षेत्र के वोटरों की समस्याएं भी दूसरे क्षेत्रों की तरह सड़क, जलभराव और बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य के इंतजाम न होने की है। हमने शहर से लेकर कुछ गांवों तक घूमकर लोगों से बात की तो तमाम मुद्दों पर चर्चा हुई। हालांकि जाति धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की बात भी कई लोगों ने बेहिचक स्वीकार की। शहर निवासी छात्र अभिषेक का कहना था कि तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। इसलिए बरेली व दूसरे शहरों में जाकर पढ़ाई करना मजबूरी है। जो भी जनप्रतिनिधि बनें, उन्हें इस बारे में सोचना चाहिए। जालंधरी सराय की शबीना व उनके साथ मौजूद दूसरी महिलाओं ने कोरोना काल की वजह से रोजगार खत्म होने की बात कही। कहा कि परिवार के आदमी दिल्ली व अन्य शहरों में कमाई करते हैं। इन दिनों वहां भी काम नहीं है। ऐसे में परिवारों की रोजी रोटी पर संकट है। कोई ऐसी सरकार बने जो रोजगार के मौके बढ़ाए तो सही रहेगा। कुंवरगांव के व्यापारी गिरीश ने मौजूदा जनप्रतिनिधि व सरकार पर भरोसा जताया। कहा कि महंगाई और दूसरी समस्या अपनी जगह पर गुंडागर्दी से निजात मिलने की ज्यादा खुशी है। बिनावर के सफदर खां ने कहा कि बदलाव बहुत जरूरी है। लगातार कोई सरकार रहती है तो जनता को वो फायदा नहीं मिलता जो मिलना चाहिए। संवाद