बदायूं। कई धुरंधरों का विधानसभा पहुंचने का सपना पूरा नहीं हो सका। कई बार चुनाव में किस्मत आजमाई, बेहिसाब लड़े भी पर पहले नंबर पर पहुंचने की हसरत पूरी नहीं हो सकी। इनमें कई धुरंधरों ने अब राजनीति से दूरी बना ली है। कुछ मुख्य धारा में बने रहने की जद्दोजहद में पार्टियां भी बदल रहे हैं तो कुछ राजनीति की मुख्य धारा से ही बाहर हो गए हैं।
विधानसभा चुनाव 1989, 1991 में शहर विधानसभा सीट से किस्मत आजमाने वाले खालिद परवेज 2002 में बिनावर विधानसभा सीट से भी चुनाव मैदान में उतरे। शहर सीट पर दोनों बार दूसरे नंबर पर रहे और बिनावर सीट पर 24 हजार से ज्यादा वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे। 2017 में भी उन्होंने उवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से शहर सीट से चुनाव लड़ा। इस बार वह 883 वोट पाकर सातवें नंबर पर खिसक गए। इसके बाद से राजनीति की मुख्यधारा से बाहर हैं।
हर प्रसाद सिंह पटेल ने 2002 में भाजपा के टिकट पर बिनावर सीट से चुनाव लड़ा। उनको पांच हजार से भी कम वोट मिले। 2007 में वह फिर से बिनावर सीट से भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे। इस बार 10 हजार से ज्यादा वोट ही हासिल कर सके। खुद को राजनीति की मुख्य धारा में बनाए रखने के लिए सपा में शामिल हुए। अब फिर भाजपा में हैं।
2017 में सहसवान सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े अरशद अली दूसरे स्थान पर रहे। इस बार वह चुनाव मैदान में नहीं हैं। हालांकि, उनके भाई पूर्व विधायक मुशर्रत अली बिट्टन बसपा के टिकट पर सहसवान से चुनाव लड़ रहे हैं।
बिनावर सीट से 1996 में सपा से चुनाव लड़ने वाले सुरेशपाल सिंह चौहान 39 हजार से ज्यादा वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। 2002 में भी उन्होंने इसी सीट से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस बार 29 हजार से ज्यादा वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। बिल्सी विधानसभा सीट से 2002 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर दूसरे नंबर पर रहे अमित मथुरिया भी सक्रिय राजनीति से दूर हैं। उसहैत विधानसभा से भाजपा के टिकट पर 1993, 1996 और 2002 राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से चुनाव लड़े ब्रजपाल सिंह शाक्य को भी विधानसभा पहुंचने का मौका नहीं मिला। मेजर कैलाश को भी बिसौली की जनता ने मौका नहीं दिया। 2012 में भाजपा और 2017 में बसपा के टिकट पर बिसौली सीट से चुनाव लड़े मेजर कैलाश ने कुछ दिन पहले ही भाजपा में वापसी की थी। इस बार वह भी चुनाव मैदान में नहीं हैं।
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कई को जनता ने दोबारा नहीं दिया मौका
2002 में बिनावर विधानसभा से बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए भूपेंद्र सिंह कुर्मी ने इसके बाद 2007 में इसी सीट से सपा से चुनाव लड़ा। नए परिसीमन में बिनावर सीट खत्म होने के बाद 2012 में शहर सीट से महान दल और 2017 में शहर सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। जनता ने उनको फिर से मौका नहीं दिया। अब उनकी भी सक्रिय राजनीति से दूरी बनी हुई है। कई और धुरंधर हैं जो कई चुनाव लड़े, लेकिन उनको जनता ने मौका नहीं दिया।
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राजनीतिक जमीन बचाए रखने को 20 साल से जद्दोजहद
तीन बार कांग्रेस से दातागंज सीट से विधायक रहीं संतोष कुमारी पाठक का जिले की राजनीति में बड़ा रसूख था। उनको भी राजनीति पिता पंडित त्रिवेणी सहाय से विरासत में मिली थी। विधानसभा में महिलाओं की बात करें तो 1989 में जिले से अंतिम महिला विधायक संतोष कुमारी पाठक ही चुनी गईं थीं। संतोष कुमारी पाठक के बेटे डॉ. शैलेश पाठक ने उनकी विरासत तो संभाली, लेकिन विधानसभा पहुंचने का उनका सपना अब तक पूरा नहीं हो सका। संतोष कुमारी पाठक ने अंतिम चुनाव 1993 का लड़ा था। इसके बाद 2002, 2002, 2012 में उनके बेटे डॉ. शैलेश पाठक ने तीन चुनाव कांग्रेस से लड़े। हर बार वह मामूली अंतर से हार गए। 2017 में उन्होंने पीस पार्टी से ताल ठोंकी। इस बार वह पांचवें नंबर पर रहे। इसके बाद पहले वह सपा में शामिल हुए अब उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। खुद की राजनीतिक जमीन बचाए रखने के लिए उनकी जद्दोजहद जारी है। संवाद