कवि षटबदन शंखधार ने मां वीणा पाणी की वंदना प्रस्तुत की। इसके बाद काव्यधारा बही। डा. व्यथित ने देश की शान में पढ़ा- चमन की आन लिखता हूं, वतन की शान लिखता हूं
लहू की रोशनाई में, मैं हिंदुस्तान लिखता हूं।
डा. शैलेंद्र ने मौजूदा परिवेश में कलमकारों को आइना दिखाते हुए सुनाया-
जो उजालों के तरफदार नहीं हो सकते, वो किसी के मददगार भी नहीं हो सकते।
सच को सच कहने की हिम्मत ही नहीं हो जिनमे, वो कुछ भी होंगे लेकिन कलमकार नहीं हो सकते।
संचालन कर रहे कवि पवन शंखधार ने सुनाया-
पतझड़ का मधुमास नहीं हूं, मैं कोई अहसास नहीं हूं
मेरा चिंतन रजनीगंधा, परिचय का मोहताज नहीं हूं।
गोष्ठी में विष्णु गोपाल अनुरागी, अमन मयंक शर्मा, आदर्श कुमार समय, जयवीर चंद्रवंशी जय, अभिषेक अनंत, अचिन मासूम, अजीत रस्तोगी, संजय सक्सेना, उमेश अकेला, विनोद शदव, रजनीश शर्मा ने रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को आनंदित किया।