बदायूं/ कादरचौक। ब्लॉक के कुछ गांवों में स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। यह महिलाएं परिश्रम और लगन से अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का काम कर रही हैं। कादरचौक के बमनौसी गांव की ज्योति इसकी मिसाल हैं। ज्योति व उनके समूह की महिलाओं ने फूलों की खेती शुरू की है। वे बुके, सेहरा बनाने के साथ ही मंडी में जाकर भी फूलों की बिक्री करती हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत चलाए जा रहे स्वयं सहायता समूह कई गांवों में बड़े परिवर्तन के साक्षी बने हैं। शराब को चर्चित रहे गांव धनूपुरा के अलावा कादरचौक ब्लॉक के ही बमनौसी व सदाठेर गांवों में भी बदलाव की बयार बह रही है। बमनौसी की बात करें तो यहां जय संतोषी मां समूह की सखी ज्योति देवी ने नौ और महिलाओं के साथ फूलों की खेती का काम शुरू कर डेढ़ साल में ही उल्लेखनीय सफलता पाई है। यह महिलाएं समूह में एकत्र धन व अनुदान से फूलों की खेती करती हैं और फिर उसे बुके, सेहरा आदि बनाने में उपयोग कर बेचती हैं। उझानी व बदायूं की मंडी में फूल बेचने जाती हैं तो कई बार शादियों में स्टेज सजाने का काम भी परिवार के पुरुषों की मदद से करती हैं। महिलाओं के सकारात्मक काम में ब्लॉक के अधिकारी भी इनकी मदद करते हैं।
ज्योति बोलीं- अब घर बैठे बिक रहे फूल
ज्योति के पति प्राइवेट शिक्षक हैं जो ट्यूशन पढ़ाकर घर का गुजारा कर रहे थे। इससे गृहस्थी का पहिया जैसे तैसे चल रहा था। करीब डेढ़ साल से ज्योति का फूलों की खेती और व्यापार का काम चल पड़ा है। ज्योति बताती हैं कि शुरू में लोगों को पता नहीं था तो फूलों को बेचने में ज्यादा समस्या आई। अब तमाम लोग घर से ही फूल ले जाते हैं। साथ ही बुके, सेहरा व सजावट के अन्य काम को ऑर्डर भी मिल जाते हैं। पति व परिवार पूरा सहयोग करते हैं।
मशरूम की खेती ने दी सदाठेर को पहचान
मां संतोषी समूह सदाठेर की 12 महिलाएं मशरूम की खेती से तरक्की की इबारत लिख रही हैं। समूह सखी प्रियंका देवी ने बताया कि नवंबर में यह काम शुरू होता है जो अप्रैल में बंद हो जाता है। इसमें 32 से 48 फिट की बंद झोपड़ी बनाई जाती है। इसमें बांस के स्ट्रेचर बनाकर भूसा सडा कर देशी खाद मिलाकर बिछाते हैं। फिर 80 से 120 किलो बीज स्ट्रेचर पर डाला जाता है। मशरूम तैयार होने पर प्रियंका अपनी साथी सोमवती व अन्य के साथ उसकी पैकिंग करती हैं। इसे परिवार के लोगों की मदद से बदायूं व बरेली की मंडियों में पैकिंग कर बेचा जाता है। सोमवती ने बताया कि झोपड़ी में 20 से 35 डिग्री तक के तापमान में मशरूम की फसल रहती है। फसल से प्रतिदिन की कमाई होती है
बेहतर काम कर रहीं महिलाएं
कादरचौक ब्लॉक के एडीओ कृष्णपाल सिंह बताते हैं कि सदाठेर गांव की प्रियंका व उनकी साथी मशरूम की खेती तो बमनौसी की ज्योति फूलों से आजीविका कमा रही हैं। समूह में न्यूनतम दर पर कर्ज मिलता है। इसे भी समूह के सही चलने पर अनुदान के रूप में लौटा दिया जाता है। बेहतर काम करने वाली महिलाओं को प्रोत्साहित किया जाता है। फिछले दिनों मशरूम की प्रदर्शनी लगाकर बड़े अधिकारियों ने महिलाओं को सम्मानित किया था।