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प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ रहा कालीन उद्योग!

Sun, 03 May 2015 07:41 PM IST
Sahaswan
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सहसवान कस्बे का कालीन उद्योग प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ता नजर आ रहा है। यूं तो यहां गढ़ी गई उम्दा नक्काशी वाली कालीनों की धाक अमेरिका और ब्रिटेन तक है, फिर भी बड़े एक्सपोर्ट्स ही इसके मुनाफे को भुनातेे हैं। छोटे कारीगरों को हाड़तोड़ मेहनत के बदले चंद दामों से ही गुजारा करना पड़ता है। इन हुनरमंद हाथों को काम और सही दाम मिले तो दम तोड़ते कालीन कारोबार को संजीवनी मिल सकती है।
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सहसवान में कालीन उद्योग 1976 में मोहल्ला बजरिया निवासी रामानंदन सोमानी ने शुरू किया था। करीब 47 साल में कालीन कारोबार ने आधी दुनिया का सफर तय जरूर किया लेकिन अब यह कारोबार बुरे दौर से गुजर रहा है। उस समय जिले में रामानंद इकलौते कालीन कारोबारी थे। कालीन उद्योग बढ़ा तो कारीगरों की कमी आड़े आने लगी। इसके बाद उत्तर प्रदेश निर्यात निगम ने बच्चों को कालीन बुनाई सिखाने के लिए सहसवान में पहला सेंटर खोला लेकिन 1986 में बाल श्रम कानून लागू हुआ तो यह सेंटर बंद हो गया। सेंटर बंद होने के बाद आगरा और जयपुर की एक्सपोर्ट कंपनियों ने कालीन उद्योग शुरू कर दिया। रामानंदन सोमानी के निधन के बाद उनके पुत्र मनोज सोमानी ने कारोबार संभाला। धीरे-धीरे कालीन के कारोबारी बढ़े तो आगरा और जयपुर की कंपनियां कच्चा माल देकर ठेके पर कालीन बुनाई कराने लगीं। बाद में कई दूसरी एक्सपोर्ट कंपनियों की भी आमद हो गई।
भदोही की रूपेश एंड ब्रदर्श ने सहसवान में आमद कराने के बाद गांव-गांव और गली-गली कालीन बुनाई के अड्डे लगवा दिए। बाद में जयपुर रक्स, सरस्वती ग्लोबल, चौधरी एक्सपोर्ट जयपुर, एलाइट एक्सपोर्ट आगरा, परशियन कारपेट जयपुर समेत करीब एक दर्जन एक्सपोर्ट कंपनियों ने सहसवान में कालीन बुनाई शुरू करा दी।
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जिले में किसी के पास नहीं निर्यात लाइसेंस
जिले में किसी के पास निर्यात लाइसेंस न होने का फायदा भी इन कंपनियों को मिला। ठेके पर कालीन बुनाई कराकर यह एक्सपोर्ट कंपनियां कालीन की सप्लाई विदेशों के लिए करने लगीं।

कारोबार से कालीन निर्माताओं का मोह भंग
कहने को तो कालीन कारोबार का टर्नओवर करोड़ों में है और इसकी सप्लाई अमेरिका, ब्रिटेन जैसे कई विकसित देशों में होती है लेकिन कालीन बनाने वाले कारीगरों को इसका लाभ नहीं मिल रहा। ऐसे में इनका इस काम से मोह भंग हो रहा है।

निराश हैं स्थानीय कारोबारी
कालीन कारोबारी पंकज सोमानी और मनोज सोमानी की मानें तो विदेशों के लिए कालीन का निर्यात करने वाली कंपनियां समय से भुगतान नहीं करतीं। सरकार की ओर से भी कालीन कारोबार के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलता। पहले कालीन कारोबार पर 25 प्रतिशत सब्सिडी थी इसे घटा कर अब पांच प्रतिशत कर दिया गया है। उपेक्षित सरकारी नीतियों की वजह से विदेशों तक फैला कालीन कारोबार आज बुरे दौर से गुजर रहा है।

कालीन उद्योग को अलग से कोई सुविधा का प्रावधान तो नहीं है लेकिन कलस्टर डवलपमेंट स्कीम के तहत ही कालीन के कारोबारी भी लाभ उठा सकते हैं। इसके तहत निर्यात में भी जो छूट है उसका लाभ मिल सकता है।
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वीरेंद्र कुमार, जीएम, डीआईसी
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