बदायूं। शहर के प्रमुख मंदिरों में शामिल बिरुआबाड़ी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का विशेष केंद्र है। सौ साल से भी अधिक पुराना यह मंदिर आस्था के साथ अपनी सुंदरता और भव्यता के लिए भी पहचाना जाता है। कभी यहां निकले छोटे शिवलिंग के स्थान पर अब यहां कई फुट ऊंचे शिवालय की स्थापना हो चुकी है।
बिरुआबाड़ी मंदिर आस्था के साथ-साथ भव्यता में भी अपना अलग स्थान रखता है। कई बीघा में फैले इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। बुजुर्ग बताते हैं कि लगभग सौ साल पहले यहां बिरुआ नाम का एक माली खेती करता था। फसल को जोतने के लिए जब भी हल चलाता तो एक जगह जाकर वह अटक जाता था। पहले तो बिरुआ ने इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब हल बार-बार एक ही जगह जाकर अटकने लगा तो उसने इसकी खोदाई की। खोदाई के बाद वहां एक पत्थरनुमा चीज निकली। ध्यान से देखने पर पता चला कि वह एक शिवलिंग था। उसके बाद उसने वहां पर मठिया बनाकर पूजा शुरू कर दी। काफी समय तक उसने इस स्थान पर सेवा की।
साल 1932 में उसने इस मठिया की जिम्मेदारी लाला हरसहायमल श्यामलाल सराफ को सौंप दी। इसके बाद 1984 में मंदिर को वृहद रूप देते हुए इसका जीर्णोद्धार शुरू कराया गया। तब से इसे बिरुआबाड़ी मंदिर कहा जाने लगा। बताते हैं कि एक से डेढ़ माह तक यहां लगातार काम कराते हुए भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया गया।
मठिया वाले स्थान पर शिवालय बनाया गया जो आज भव्य रूप ले चुका है।
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गीता भवन में अर्जुन और श्रीकृष्ण की प्रतिमाएं है विशेष आकर्षण
मंदिर के पुजारी सुरेंद्र पांडेय पिछले 45 सालों से सेवा कर रहे हैं। वह बताते हैं कि इस समय मंदिर में श्री राम दरबार, शिव परिवार, योगिराज कृष्ण, बाला जी दरबार, हनुमान जी, बांके बिहारी की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में ही एक गीता भवन बना हुआ है जहां अर्जुन का गीता का उपदेश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण की विशाल प्रतिमा स्थापित है। गीता भवन का उपयोग मंदिर में होने वाले धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता है। सावन में यहां जलाभिषेक करने वालों का तांता लगा रहता है।