बदायूं। जब सिनेमा की शुरुआत नहीं हुई थी तब लोगों के मनोरंजन का जरिया सिर्फ रंगमंच था। आज सिनेमा जब चरम पर है, तब भी एक तबका है जो थियेटर को पसंद करता है। जिले में रंगमंच कर्मियों की संख्या सीमित है, लेकिन वे अपनी कला और रंगमंच को बचाए रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं, जरूरत है तो उन्हें बस आगे बढ़ने के लिए एक मौके की। यह कलाकार जिंदाजली से जीने की कला भी सिखाते हैं। विश्व रंगमंच दिवस पर ऐसे ही कलाकारों से बात करने पर उन्होंने काफी बातें साझा कीं।
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15 धारावाहिकों में काम कर चुके नंदकिशोर
रिटायर्ड शिक्षक नंद किशोर को थियेटर का जुनून है। वह बताते हैं कि 1981 में उन्होंने सबसे पहला अभिनय मुंशी प्रेमचंद्र के उपन्यास गोदान पर आधारित नाटक में किया था। उस समय रंगमंच सिनेमा से ज्यादा प्रभावशाली था, लेकिन अब असर कम हुआ है लेकिन कलाकारों में जज्बा और जुनून अब भी है। नंद किशोर थियेटर से निकलकर मुंबई तक पहुंचे। बालिका वधू, यह रिश्ता क्या कहता है, मजहबी लड्डू समेत करीब 15 धारावाहिकों में काम किया। अब नंदकिशोर रंगकर्मियों की पौध तैयार कर रहे हैं।
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पूड़ी का ठेला लगाने वाले मुकेश हैं गजब के फनकार
मुकेश कश्यप कई धारावाहिकों में काम कर चुके हैं। धारावाहिकों और फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने के साथ वह गाने भी लिखते हैं। मुकेश को अभिनय में ज्यादा कामयाबी नहीं मिली, लेकिन अब वह प्रोडक्शन के क्षेत्र में हाथ आजमाना चाहते हैं। कहने को तो गांधी पार्क के पास छोले-भटूरे का ठेला लगाते हैं, लेकिन फिल्मों से उनको काफी लगाव है। उन्होंने अच्छा बजट खर्च कर एक विजय रथ नाम की फीचर फिल्म भी तैयार की है। मुकेश काफी समय मुंबई रहे हैं।
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मुंबई में काम किया फिर घर लौटे आसिम पेंटर
छोटे और बड़े पर्दे पर अभिनय कर चुके आसिम को अभिनय का जुनून है, लेकिन रोजी-रोटी का साधन न होने के कारण वह आगे नहीं बढ़ पा रहे। पेंटर की दुकान चलाने वाले आसिम का कहना है कि कलाकारों की सुनने वाला कोई नहीं। पिछले 20 साल से थियेटर और सिनेमा से जुड़े आसिम ने मुंबई में भी कुछ समय बिताया। परिवार की जिम्मेदारियों के कारण लौटना पड़ा। उनका कहना है कि अब सिर्फ जुनून बाकी है इसके अलावा उनके पास कुछ नहीं बचा है।
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टाइपिस्ट सर्वेश को गीत संगीत का जुनून
नाटक, संगीत, लोकगीत आदि से जुड़े सर्वेश सक्सेना ने अपना सफर 1980 में शुरू किया था। संगीत उनको अपनी मां से विरासत में मिला। दूरदर्शन बरेली पर भी उनके कई कार्यक्रम प्रसारित हो चुके हैं। रंगमंच और संगीत में सर्वेश भी ज्यादा ऊंचाइयों पर नहीं पहुंच सके। इसके बाद उन्होंने अपना म्यूजिक क्लब खोला। अब वह कचहरी पर टाइपिंग के साथ जागरण करने के साथ छात्र-छात्राओं को संगीत की शिक्षा भी देते हैं। सर्वेश का कहना है कि प्रोत्साहन मिले तो यहां के कलाकार भी नाम रोशन कर सकते हैं।
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आजीविका को सूचना विभाग से जुड़े बहार हुसैन
बहार हुसैन थियेटर से जुड़े रहे। उन्होंने कई धारावाहिकों के साथ फिल्मों में भी काम किया है। प्यार ही जिंदगी है, सितम, धार फिल्मों और सीआईडी, क्राइम पेट्रोल, गुमराह, निमकी मुखिया जैसे धारावाहिकों में भी वह अभिनय कर चुके हैं। इसके साथ ही कुछ म्यूजिक एलबम में भी उन्होंने अभिनय किया। उनका कहना है कि अगर प्रोत्साहन और अवसर मिलें तो यहां की प्रतिभाएं भी काफी आगे बढ़ सकती हैं। वर्तमान में बहार हुसैन सूचना विभाग में सेवाएं दे रहे हैं।
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रंगकर्मी विकास फार्मेसी की कर रहे पढ़ाई
विकास गौतम का कहना है कि जिले में रंगमंच कलाकारों की अच्छी संख्या है, लेकिन प्रोत्साहन की कमी है। नाटक भी होते रहते हैं, लेकिन कोई प्रेक्षागृह न होने के कारण रंगमंच को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा। रंगमंच सिनेमा के मुकाबले लोगों को जागरूक करने का बड़ा जरिया हो सकता है। नाटक के जरिये लोग किसी बात को आसानी से और जल्द समझते हैं। इन दिनों फार्मेसी की पढ़ाई करने के साथ रंगमंच से जुड़ा हूं। रंगमंच को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना चाहिए।