मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बदायूं जिले में आने की संभावना के बीच हर किसी की नजर विकास की बड़ी सौगात मिलने की ओर टिकी हुई है। लोग समझ भी रहे हैं कि सौगात कोई छोटी-मोटी नहीं बल्कि ऐसी होगी जो कायाकल्प कर देगी। ऐसे में जीवनदायिनी का तट अछूता क्यों रह जाए। गंगाघाट पर किसी स्नान पर्व पर हजारों तो विशेष पर्वों पर श्रद्धालुओं की संख्या लाखों को पार कर जाती है लेकिन उन्हें सुविधा और सुरक्षा उम्मीद के अनुरूप नहीं मिल पाती। जीवनदायिनी के तटों को ऐसे भागीरथ की है जरूरत है जो उसका कायाकल्प कर दें।
बदायूं जिले में कछला गंगघाट एक ऐसा इकलौता घाट है जहां रुहेलखंड ही नहीं बल्कि बृज के कई जिलों के साथ मध्य प्रदेश और राजस्थान के श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। हकीकत पर गौर करें तो पूर्णिमा वाले दिन या फिर विशेष स्नान पर्व पर श्रद्धालुओं को घाट पर कोई सुविधा नसीब नहीं हो पाती। गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना करने के लिए साफ जगह नहीं मिल पाती। महिलाएं खुले में कपड़े बदलने को मजबूर रहती हैं तो श्रद्धालुओं में कुछ ऐसे भी आ जाते हैं तो खंडित मृर्तियों समेत हवन-पूजन का कचरा गंगा में प्रवाहित कर जाते हैं। ऐसा भी नहीं कि श्रद्धालुओं को सुविधा और सुरक्षा मुहैया कराने के लिए शासन स्तर से कोशिश नहीं की गई हो। न जाने क्यों, हर बार ही प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं मिल पाई। पिछले साल बाढ़ खंड ने करोड़ों रुपये की डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) भी शासन को भेज दी थी। अब चूंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आने की संभावना बढ़ गई है। उनकी नजरें इनायत हुईं जीवनदायिनी के तट का कायाकल्प भी हो जाएगा, ऐसी सबको उम्मीद है।
पक्के घाट बने तो बाढ़ में नहीं बहेंगी फसलें
उझानी। गंगा में बाढ़ तो हर साल आती है। किसी साल बाढ़ का प्रकोप अधिक होता तो कभी हालात सामान्य रहते हैं। हुसैनपुर, पिपरौल, ढकनगला, सरौता, चंदनपुर आदि कई ऐसे गांव है जिनके बाशिंदे बाढ़ के दिनों में तबाही का मंजर झेलते हैं। जानकारों की माने तो पुल के आसपास पक्के घाट बन जाने के बाद जल का प्रवाह भी सीमित होकर गुजरेगा। ऐसे में ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान भी कम उठाना पड़ेगा।