बदायूं। आज भाई-बहन के प्यार का त्योहार रक्षाबंधन है। बहनें भाइयों को राखी बांधेंगी और भाई उनकी रक्षा का वचन देंगे। इस बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं कि उनकी बहन ने अपनी जान दांव पर लगाकर भाई की रक्षा की है। शहर निवासी अमित सक्सेना उन्हीं भाग्यशाली लोगों में से एक हैं, जिनकी रगों में दौड़ता खून उनकी बहन के प्यार और त्याग की निशानी है। बहन सुलेखा की दी हुई किडनी ने अमित को जिंदगी और उनके परिवार को वो अनमोल तोहफा दिया है जो ताउम्र न भुलाने वाली चीज है।
प्राइवेट काम कर परिवार चलाने वाले अमित अब 45 साल के हैं। दातागंज के मूल निवासी अमित फिलहाल शहर की श्रीराम नगर कॉलोनी में रहते हैं। वह बताते हैं कि वर्ष 2008 में उनका ब्लडप्रेशर अचानक बढ़ने लगा था। बुखार भी ऐसा तपने लगा कि दवाओं से उतरा नहीं। चेकअप कराया तो सन्न रह गए। दोनों ही किडनी लगभग खराब हो चुकी थीं। एम्स तक दौड़ लगा ली पर किडनी ट्रांसप्लांट ही एकमात्र इलाज बताया गया। किडनी का ब्लडग्रुप मैच हुआ तो 21 साल की अविवाहित बहन सुलेखा से। सुलेखा को पता लगा कि उसकी किडनी भाई की जिंदगी बता सकती है तो वह इसे दान करने पर अड़ गईं। परिवार और रिश्तेदारों ने कहा कि शादी में अड़चन आएगी, जिंदगी को भी खतरा हो सकता है पर सुलेखा नहीं मानीं। अमित को भी बहन की जिद की खातिर झुकना पड़ा और मकर संक्रांति के दिन अपोलो अस्पताल में उनकी किडनी ट्रांसप्लांट कर दी गईं। अमित और सुलेखा दोनों ही इसके बाद स्वस्थ हैं।
कांट्रेक्टर ने खुद मांगा सुलेखा का हाथ
अमित ने बताया कि ट्रांसप्लांट के बाद वह लोग सुलेखा की शादी को लेकर चिंता में थे। तब इसी तरह का विज्ञापन अखबारों में दिया कि लड़की की एक ही किडनी है। इसके बाद गुड़गांव सदर बाजार के कांट्रेक्टर राहुल व उनके परिवार की कॉल आई। उन्होंने पूरी बात जानी। राहुल व उनका परिवार सुलेखा के इस त्याग के बारे में जानकारी पाकर इतना प्रभावित हुआ कि बिना दहेज उसका हाथ मांग लिया। उन्होंने सुलेखा की शादी कर दी। अब इनका एक बेटा भी है।
पत्नी ने मुसीबत के वक्त में पूरी की पीएचडी
अमित बताते हैं कि जिन दिनों उन्हें किडनी की समस्या और ट्रांसप्लांट हुआ उन्हीं दिनों में पत्नी मनीषा की संगीत में पीएचडी चल रही थी। पत्नी ने न केवल परिवार और उनकी बीमार मां को संभाला बल्कि अपनी पीएचडी पूरी की। अब वह डॉ. मनीषा सक्सेना हो चुकी हैं। उनका एक 17 साल का बेटा भी है।