पैसा निकालने के लिए महीनों से डाक विभाग के चक्कर काट रही था महिला
डाकघरों में बचत खातों से रुपये निकालने के लिए लोगों को किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, यह छतुइया गांव की गीता देवी से बेहतर शायद ही कोई बयां कर पाता। गीता के पति मुरारीलाल का स्थानीय डाकघर में बचत खाता था। उसने मेहनत-मजदूरी करके खाते में करीब हजार रुपये इकट्ठे कर लिए। पिछले साल मुरारी की असमय मौत हो गई। पति की मौत के बाद गीता ने रुपयों के लिए नौ महीने तक जंग लड़ी। क्लेम की धनराशि की खातिर उसने बदायूं तो कभी बरेली के चक्कर काटे। इस जंग में वह रुपये तो हासिल नहीं कर पाई लेकिन जिंदगी की जंग हार गई।
मामला कोतवाली क्षेत्र के गांव छतुइया निवासी एक ऐसे दलित परिवार से जुड़ा है जिसके मुखिया रहे मुरारीलाल ने मेहनत-मजदूरी करके स्टेशन रोड स्थित डाकघर में बचत खाता खुलवाया। बचत खाते में रकम 44 हजार रुपये से अधिक जमा हो गई। यही सोचा होगा कि वह इन रुपयों की मदद से बेटियों के हाथ पीले कर देगा लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। आठ जनवरी-2016 को मुरारीलाल की मौत हो गई। दो बेटियों समेत तीन संतानों की जिम्मेदारी उनकी पत्नी गीता पर आ पड़ी। जिम्मेदारी निभाते-निभाते वह बीमार पड़ गई। बीमार गीता ने पति के बचत खाते से धनराशि निकालने को डाकघर पहुंचकर अभिलेखीय औपचारिकताएं पूरी कर दीं। शपथपत्र भी उसी वक्त जमा कर दिया गया। पोस्टमास्टर ने धनराशि अवमुक्त कराने के लिए पहले बदायूं हेड ऑफिस फिर रीजनल कार्यालय बरेली को पत्रावली भेज दी। बदायूं और बरेली पहुंचकर गीता ने कई बार गुहार भी लगाई। अफसरों को उसने यहां तक बताया कि बीमारी की वजह से अब ज्यादा भागदौड़ नहीं कर सकती। रुपये नहीं मिलने से इलाज के अभाव में गीता ने सोमवार सुबह दमतोड़ दिया। गीता की लड़ाई में सहयोगी बने गांव के ही योगेंद्र यादव मंगलवार को डाकघर पहुंचे तो हकीकत सुन डाककर्मी भी सकते में पड़ गए। बरेली से अब तक पांच बार रिजेक्ट होकर डाकघर लौट चुकी पत्रावली के मुद्दे पर पोस्टमास्टर चेतन बाबू कहते हैं कि पोस्टमास्टर जनरल (पीएमजी) ने बरेली स्तर से आपत्ति में पहले शपथ पत्र देने फिर ब्याज का आकलन करने की बात कही गई जो 18 जून- 16 को ही पत्रावली के साथ ही भेज दी गई थी। पांचों बार उन्हें वही औपचारिकताएं दोहरानी पड़ीं।
अनाथ हुए तीन बच्चे, कौन करेगा परवरिश
पहले पिता मुरारीलाल फिर मां गीता की मौत के बाद उनके तीनों बच्चे अनाथ हो गए हैं। गीता की तीन संतानओं में सबसे बड़ी बेटी 13 साल की बबीता, छह साल की प्रेम भारती और ढाई साल का बेटा जीत है। मामा फिरोजाबाद निवासी लोकप्रकाश ने जीतू को गोद में लेकर गीता को मुखाग्नि देने की रस्म को पूरा कराया। मुरारीलाल के पास कृषि योग्य भूमि भी नहीं है। एक छोटा सा घर जरूर है लेकिन उसकी दीवारों पर प्लास्टर भी हो पाया है।