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उत्तर प्रदेश चुनाव: थोक के भाव पार्टी पदाधिकारी बना रही भाजपा, इस रणनीति से कितनी थमेगी कार्यकर्ताओं की नाराजगी

सार

उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह लगातार जिलों की टीम बढ़ा रहे हैं और नए-नए कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दे रहे हैं। इसे सभी वर्गों की पार्टी से नाराजगी दूर करने की कोशिश मानी जा रही है
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उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : Amar Ujala (File Photo)
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह इस समय पार्टी संगठन को विस्तार देने में लगे हैं। वे हर जिले की टीम मजबूत कर विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं। कार्यकर्ताओं को पद देते समय हर जिले में सामाजिक समीकरणों को पूरा ध्यान दिया जा रहा है और संबंधित जिले के हर प्रभावी वर्ग को साथ लेने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, पार्टी के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता ही पार्टी की इस रणनीति से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि सभी वर्गों को साथ लेने में काफी देर हो चुकी है और चुनाव से पहले इस तरह की कोशिश से पार्टी को बड़ा लाभ होने की उम्मीद नहीं है।

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दरअसल, 15 अगस्त के दिन भी भाजपा ने लखनऊ, गोंडा, बाराबंकी, उन्नाव और लखीमपुर जिले के पदाधिकारियों की नियुक्ति की। इसके साथ ही मेरठ और इटावा जिले में भी नए पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई। इन पदों पर नियुक्ति के समय भी ब्राह्मणों, पिछड़ों और एससी/एसटी वर्ग को जिम्मेदारी देने की कोशिश की गई।

पूर्वांचल जिले के एक ब्राह्मण नेता के मुताबिक पार्टी ने पूरे पांच साल कार्यकर्ताओं की कोई सुध नहीं ली। 2017 में मिली प्रचंड जीत के बाद पार्टी ने कार्यकर्ताओं की सुननी ही बंद कर दी। पूरा महकमा सरकार के दो-तीन लोगों तक केंद्रित होकर रह गया था। कार्यकर्ताओं की कोई बात नहीं सुनी जा रही थी। इसके बारे में शिकायत की गई कि सरकार की तो बात छोडिये, जिले प्रशासन तक में कार्यकर्ताओं की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। लेकिन उसे कार्यकर्ताओं की कोई याद नहीं आई।
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उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज के तरीकों को लेकर पार्टी के ब्राह्मण कार्यकर्ता काफी असहज थे। इसे लेकर प्रदेश अध्यक्ष के साथ-साथ केंद्रीय स्तर तक भी जानकारी दी गई थी। कहा गया था कि केंद्रीय इकाई ने प्रदेश सरकार से कार्यकर्ताओं की उचित शिकायतों पर ध्यान देने को कहा था, लेकिन आरोप है कि इसके बाद भी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा जारी रही।

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पार्टी को इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में ही कार्यकर्ताओं की याद आई। लेकिन उस समय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव और उनकी छवि के कारण कोई भी कार्यकर्ता विरोध करने की स्थिति में नहीं था। वैसे भी, कार्यकर्ताओं की नाराजगी प्रदेश सरकार से थी, केंद्र से नहीं, लिहाजा लोकसभा चुनाव के समय कार्यकर्ताओं ने कोई विरोध नहीं किया। इसके बाद कार्यकर्ता एक बार फिर हाशिए पर ही रहा।

लेकिन अब जबकि प्रदेश विधानसभा के चुनाव सर पर आ गए हैं, पार्टी को कार्यकर्ताओं की याद आ रही है। उन्हें प्रदेश से लेकर जिले तक की इकाइयों में विभिन्न पद देकर उनका साथ लेने की कोशिश की जा रही है। इसमें हर जिले के प्रभावी वर्ग को प्रमुखता देकर सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की जा रही है।

एक अन्य नेता के मुताबिक लगातार पांच साल उपेक्षा झेलने के बाद अब कार्यकर्ताओं को लॉलीपॉप देकर उन्हें बरगलाने की कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन इसका जमीनी स्तर पर कोई असर पड़ना मुश्किल माना रहा है क्योंकि नाराज कार्यकर्ता दिल से पार्टी के साथ नहीं लगेंगे। जिस रफ्तार से पार्टी पदाधिकारियों की नियुक्ति कर रही है, लग रहा है कि चुनाव आते-आते पार्टी में पदाधिकारियों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाएगी, लेकिन कार्यकर्ता नहीं रह जाएंगे। नेता के मुताबिक, आशंका तो यहां तक जताई जा रही है कि ऐन चुनाव से पहले कई नेता समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। किसी भी कीमत पर उत्तर प्रदेश जीतने की रणनीति बना रहे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को इससे झटका लग सकता है।ो
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