पार्टी को इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में ही कार्यकर्ताओं की याद आई। लेकिन उस समय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव और उनकी छवि के कारण कोई भी कार्यकर्ता विरोध करने की स्थिति में नहीं था। वैसे भी, कार्यकर्ताओं की नाराजगी प्रदेश सरकार से थी, केंद्र से नहीं, लिहाजा लोकसभा चुनाव के समय कार्यकर्ताओं ने कोई विरोध नहीं किया। इसके बाद कार्यकर्ता एक बार फिर हाशिए पर ही रहा।
लेकिन अब जबकि प्रदेश विधानसभा के चुनाव सर पर आ गए हैं, पार्टी को कार्यकर्ताओं की याद आ रही है। उन्हें प्रदेश से लेकर जिले तक की इकाइयों में विभिन्न पद देकर उनका साथ लेने की कोशिश की जा रही है। इसमें हर जिले के प्रभावी वर्ग को प्रमुखता देकर सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की जा रही है।
एक अन्य नेता के मुताबिक लगातार पांच साल उपेक्षा झेलने के बाद अब कार्यकर्ताओं को लॉलीपॉप देकर उन्हें बरगलाने की कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन इसका जमीनी स्तर पर कोई असर पड़ना मुश्किल माना रहा है क्योंकि नाराज कार्यकर्ता दिल से पार्टी के साथ नहीं लगेंगे। जिस रफ्तार से पार्टी पदाधिकारियों की नियुक्ति कर रही है, लग रहा है कि चुनाव आते-आते पार्टी में पदाधिकारियों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाएगी, लेकिन कार्यकर्ता नहीं रह जाएंगे। नेता के मुताबिक, आशंका तो यहां तक जताई जा रही है कि ऐन चुनाव से पहले कई नेता समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। किसी भी कीमत पर उत्तर प्रदेश जीतने की रणनीति बना रहे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को इससे झटका लग सकता है।ो