मरने की परवाह किसे थी, आजादी का था जुनून
नूरपुर (बिजनौर)। आजादी के आंदोलन में नूरपुर क्षेत्र के क्रांतिकारियों का अहम योगदान रहा है। सन 1942 में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ नारे का नूरपुर में ऐसा असर हुआ कि आजादी के हजारों मतवालों ने नूरपुर थाने पर एकत्र होकर भारतीय झंडा फहरा दिया। इस दौरान पुलिस द्वारा चलाई गई गोली से गांव गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह एवं अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह शहीद हो गए थे। गांव ढेली निवासी मुंशीराम पैर में गोली लगने से घायल हुए थे। इस मामले में करीब 32 लोग गिरफ्तार किए गए थे और छह हजार रुपये सामूहिक जुर्माना लगाया था।
नूरपुर थाने के अपराध रजिस्टर में इस घटना का उल्लेख है। उक्त रिपोर्ट उस समय फारसी में लिखी गई थी, जिसका बाद में हिंदी में अनुवाद कर पर्चा रजिस्टर में चस्पा किया गया है। गांव अस्करीपुर निवासी योगेश शर्मा के मुताबिक गांधीजी के नारे के बाद 11 अगस्त 1942 को नूरपुर क्षेत्र के क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक हुई जिसमें 16 अगस्त को नूरपुर थाने पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया गया। 16 अगस्त को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक क्रांतिकारियों का एक जत्था फीना की ओर से क्षेत्रपाल सिंह के नेतृत्व में, दूसरा जत्था गोहावर की ओर से परवीन सिंह, रिक्खी सिंह एवं नारायन सिंह के नेतृत्व में और तीसरा जत्था ताजपुर की ओर से डॉ. राजकुमार के नेतृत्व में नूरपुर पहुंचा। पुलिस ने फीना वाले जत्थे को नूरपुर से बाहर ही लाठीचार्ज कर रोकने का प्रयास किया पर किसी तरह करीब 15 हजार लोग नूरपुर थाने तक पहुंच गए।
थानेदार ने करा दिया था लाठीचार्ज
नूरपुर के वैद्य जगनंदन प्रसाद एवं ताजपुर के डॉ. राजकुमार ने थानेदार से बात कर शांतिपूर्ण ढंग से थाने पर झंडा फहराने की बात कही। थानेदार ने उनकी बात नहीं मानी तथा भीड़ पर लाठीचार्ज करा दिया। भीड़ के वहां से न हटने पर पुलिस ने गोली चला दी। इस दौरान थाने पर झंडा फहराने का प्रयास कर रहे गांव गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह मौके पर ही शहीद हो गए। अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह ने जेल के अस्पताल में दम तोड़ा तथा पैर में गोली लगने से घायल हुए ढेली अहीर निवासी मुंशीराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
थाने में मौजूद है शहीदों और गिरफ्तार हुए क्रांतिकारियों का रिकॉर्ड
नूरपुर थाने के रिकॉर्ड के मुताबिक इस मामले में नूरपुर निवासी राजकुमार, कृपाशंकर, उमराव सिंह, कल्लन, नौबहार सिंह, नियादर, बुद्धु, चंदन सिंह, होरी, बहाव, रामस्वरूप, पतराम सिंह, जसराम सिंह, मल्लु, नारायण, किशोरी, चंद्रपाल, गणेषी, बलदेव सिंह, प्रताप सिंह के अलावा चांदपुर निवासी क्षेत्रपाल सिंह, कल्लु चौहान, मूला सिंह व लल्लु उर्फ कल्लु के नाम प्रकाश में आए थे, जिन्हें मुकदमे में शामिल किया गया था। प्रदर्शन के सिलसिले में करीब 32 लोग गिरफ्तार किए गए। छह हजार रुपये सामूहिक जुर्माना लगाया गया। गिरफ्तार लोगों को लोअर कोर्ट से छह-छह वर्ष कारावास की सजा मिली। अपील के बाद सत्र न्यायालय से 16 व्यक्ति छूट गए शेष को दो-दो वर्ष की सजा हुई। फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील की गई, जिसके बाद अप्रैल 1944 में सभी की रिहाई हुई। परवीन सिंह एवं रिक्खी सिंह जिस स्थान पर शहीद हुए थे उस स्थान पर उनका स्मारक बना हुआ है, जिस पर प्रत्येक वर्ष 16 अगस्त को मेले का आयोजन किया जाता है।