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जब ओलावृष्टि ने उजाड़ दिया था मेला

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जब ओलावृष्टि ने उजाड़ दिया था मेला
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बिजनौर। विदुर कुटी में लगने वाले गंगा स्नान मेले में सन 1972 में ओलावृष्टि हुई थी कि लोगों की जान पर बन आई। हर कोई अपनी जान बचाने में लगा था। परिवार की किसी को चिंता नहीं थी। ओलावृष्टि से बचने को लोगों ने मेले में लगी दुकानों से तमाम कंबल लूट लिए थे और डेरों में जा घुसे थे।
गंगा और नदियों के तट पर हर साल मेला लगता है। इस मेले में लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। 1972 में भी श्रद्धालु खुशी खुशी मेले में गए थे। श्रद्धालुओं को मालूम नहीं था कि मेले में उनकी जान पर बन आएगी। मुख्य स्नान का उस समय भी मंगलवार का दिन था। तेज बारिश के साथ मोटे ओले पड़ने लगे। यह देखकर श्रद्धालुओं की सांसे फूलने लगीं। अफरा-तफरी मची थी।
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जाट महासभा के जिलाध्यक्ष शूरवीर सिंह बताते हैं कि ऐसा ओला मेले में फिर कभी नहीं देखा। एक महिला ने ओलों से बचने के लिए अपनी सास को अपने ऊपर लेटा लिया था। महिला तो बच गई पर उसकी सास की मौत हो गई। उस समय मेले में खादी आश्रम के अलावा कंबलों की तमाम दुकानें लगती थीं। लोगों ने दुकानों से तमाम कंबल लूट लिए। जान बचाने के लिए लोगों के डेरों में जा घुसे। पूरा मेेला उसी दिन बारिश व ओला रुकने पर उखड़ गया था। मेले में जाने वालों ने ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़े पहन रखे थे। कपड़ों में भी बारिश का पानी भर गया। मेले में आने वाले त्राहि त्राहि कर रहे थे। प्राय: सबका यही कहना था कि किसी तरह से बचकर घर पहुंच जाएं।
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घटना को 47 साल बीत गए पर मेले में जाने वालों को लगता है कि आज की ही बात हो। धामपुर के शिव मंदिर के पास की रहने वाली निर्मल बताती हैं कि वह उस साल बिजनौर से बीटीसी कर रहीं थी। परिवार और मिलने वालों ने स्नान के लिए तिगरी मेले मेें जाना तय किया। सवेरे सब ट्रक से चले। तिगरी मेले से काफी पहले बारिश को देख ट्रक चालक ने एक होटल पर ट्रक यह कहकर रोक दिया कि मौसम खराब है। बारिश में आगे जाना ठीक नहीं। वे ट्रक से उतर कर होटल में घुसे कि बारिश और तेज हो गई। कुछ देर में ओले पड़ने लगे। होटल के बाहर बर्फ की चादर बिछ गई। होटल वाले से कहकर खिचड़ी बनवाईं। वहीं रुके रहे। गंगा स्नान सब भूल गए। बारिश रुकने पर वहां से गंज पहुंचे तो भगदड़ मची थी। सब किसी तरह से घर पहुंचना चाहते थे। काफी व्यक्ति उनके ट्रक में चढ़ गए।
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