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शांति सेना से सीधे गए थे चीन के खिलाफ युद्ध के मैदान में

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सेवानिवृत्त लांसनायक लोकमन सिंह। - फोटो : BIJNOR
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शांति सेना से सीधे गए थे चीन के खिलाफ युद्ध के मैदान में
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बिजनौर। चीन से सन 1962 का युद्ध बहुत विषम परिस्थितियों में लड़ा था। सेना के पास रशीयन राइफल स्टोर में रखी थीं, लेकिन उनके इस्तेमाल की सरकार ने इजाजत नहीं दी थी। एक सैनिक को केवल 50 गोली ही दी गईं थी। थ्री नॉट थ्री राइफल को बार बार लोड करके सैनिक दुश्मनों पर निशाना साधते थे। जहां से गोली चलाते थे वहीं कुछ खाते थे, शौच करते थे और गोली चलाने में लग जाते थे। आंखों में नींद नहीं थी, केवल कुछ देर के लिए झपकी ही लगती थी।
सेना से लांसनायक पद से सेवानिवृत्त हुए लोकमन सिंह बताते हैं कि वे सन 1957 में सेना में भर्ती हुए थे। सन 1962 में शांति सेना में गाजा पट्टी गए थे। शांति सेना के सभी सैनिकों को बुलाकर सीधे युद्ध के मैदान में भेज दिया गया। वे कर्नल अवस्थी के नेतृत्व में तैनात हुए। उनकी सेना की एक टुकड़ी ऐसे ही पेट्रोलिंग के लिए आगे गई जैसे इस समय लद्दाख में गई थी। चीनी सैनिकों ने आगे गई टुकड़ी पर धोखे से पीछे से हमला कर दिया और सभी को मार दिया। इसके बाद पीछे की टुकड़ी ने मोर्चा संभाला। उस समय हर जवान को एक थ्री नॉट थ्री राइफल और 50 कारतूस दिए गए थे। जबकि चीनी सेना के पास मशीनगन थी। उनकी एक मशीनगन भारत की पूरी टुकड़ी को खत्म करने लायक गोली बरसाती थी। लोकमन सिंह बताते हैं कि उनके पास भी रशियन राइफल थी लेकिन वह स्टोर में रखी थी। सरकार ने रशियन राइफल के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी।
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सोच समझकर कर चलानी होती थी गोली
लोकमन सिंह कहते हैं कि लड़ाई के दौरान एक एक गोली बहुत सोच समझकर चलानी होती थी। अगर जल्दी चलाते थे तो भी राइफल को रिलोड करने में ही वक्त लग जाता था। उनकी टुकड़ी ने कर्नल अवस्थी को लौट जाने और बड़ी टुकड़ी के साथ आने को कहा था। लेकिन कर्नल अवस्थी ने मना कर दिया था। उन्होंने कहा था कि वे अपने जवानों को किसी भी सूरत में छोड़कर नहीं जाएंगे। कर्नल अवस्थी अपने सैनिकों के साथ शहीद हो गए। लड़ाई के समय जहां से मोर्चा संभालते थे वहीं थोड़ा बहुत जो रसद बचा था उसे खाते थे। वहीं पर शौच करते थे और उसे पत्तों, मिट्टी से ढक कर लड़ाई में लग जाते थे। उन्होंने भी सात आठ दिन तक मोर्चा संभाला था। बताते हैं कि तब किसी को सोने तक के लिए वक्त नहीं आता था। कभी कभी बंदूक का ट्रिगर पकड़े पकड़े कुछ देर की झपकी लग जाती थी। आंख खुलते ही फिर से लड़ाई में लग जाते थे।
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