धामपुर के क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम केंद्रीय वस्त्रागार में यर्वदा चरखे से कताई करते कर्मचारी
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कभी स्वावलंबन का प्रतीक था, आज अतीत हो गया चरखा
धामपुर। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चरखा आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक माना जाता था, लेकिन आज चरखा अतीत की वस्तु हो गया है। सरकार की बेरुखी और आधुनिकता की दौड़ में लोग खादी और चरखे से दूर होते चले गए। धामपुर के क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम में आज भी करीब साढ़े तीन दशक पुराना यर्वदा चरखा है। लेकिन अब इसका प्रयोग नहीं होता है। इसे शोपीस के रूप में स्टोर में रख रखा है। बताया गया कि महात्मा गांधी जब यर्वदा जेल में थे। तो उन्होंने जेल में रहकर इसी चरखे से सूत की कताई कर कपड़ा तैयार किया था। देश के लोगों को संदेश दिया था कि प्रतिदिन एक घंटा चरखे से सूत की कताई करने पर आराम के साथ मनुष्य अपने वस्त्रों को तैयार करने को कपड़ा बना सकता है।
गांधी आश्रम में कार्यरत कर्मचारी धर्मदेव सिंह चौहान का कहना है कि उन्हें गांधी आश्रम में नौकरी करते हुए करीब 36 साल हो गए है। जब उनकी नौकरी लगी थी तो संस्थान की ओर से उन्हें यर्वदा चरखे को चलाने को प्रशिक्षण दिया गया था। महीपाल सिंह ने बताया कि यर्वदा चरखे से कम सूत की कताई होती थी। जैसे जैसे आबादी बढ़ती गई और नए आधुनिक चरखों का आविष्कार होता गया तो पुराने चरखे सभी किनारे होते गए। गोविंद सिंह व नरगिस का कहना है कि चरखा एक हस्तचालित युक्ति है। जिससे सूत तैयार किया जाता है। इसका उपयोग कुटीर उद्योग के रूप में सूत उत्पादन में किया जाता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में यह आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक बन गया था। चरखा यंत्र का जन्म और विकास कब तथा कैसे हुआ। इस पर चरखा संघ की ओर से काफ़ी खोजबीन की गई थी। अंग्रेजों के भारत आने से पहले भारत भर में चरखे और करघे का प्रचलन था। 1500 ई. तक खादी और हस्तकला उद्योग पूरी तरह विकसित था।
केंद्रीय वस्त्रागार के व्यवस्थापक सुरेंद्र कुमार मिश्रा का कहना है कि अब तो कई प्रकार के चरखे बाजार में है। भारत में चरखे का इतिहास बहुत प्राचीन होते हुए भी इसमें उल्लेखनीय सुधार का काम महात्मा गांधी के जीवनकाल में हुआ। 1908 में गांधी जी को चरखे की बात सूझी थी। जब वे इंग्लैंड में थे। उसके बाद वे बराबर इस दिशा में सोचते रहे। वे चाहते थे कि चरखा कहीं न कहीं से लाना चाहिए। 1916 में साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) की स्थापना हुई। बड़े प्रयत्न से दो वर्ष बाद 1918 में एक विधवा बहन के पास खड़ा चरखा मिला।
कर्मचारी गुलाब सिंह चौहान ने कहना है कि आज के दौर में सब खड़े चरखे चलाते है। यर्वदा चरखा कोई नहीं चलाता। खड़े चरखे में एक बैठक, दो खंभे, एक फरई (मोड़िया और बैठक को मिलाने वाली लकड़ी) और आठ पंक्तियों का चक्र होता है। देश के भिन्न भिन्न भागों में भिन्न भिन्न आकार के खड़े चरखे चलते हैं। उनमें चिकाकौल (आंध्र) का खड़ा रखा चरखा सबसे अच्छा था। इसके चाक का व्यास 30 इंच था और तकुवा भी बारीक तथा छोटा था। अशोक सिंह बताते हैं कि जब से सरकार और संस्थान की बेरूखी बढ़ी है। तब से चरखा, खादी जनता से दूर हो गए है। एक समय था कि जब देश का आम व्यक्ति खादी के वस्त्रों को अन्य वस्त्रों की तुलना में पहनना ज्यादा पसंद करता था।