बिजनौर। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने में बिजनौर के क्रांतिकारी बहुत सक्रिय रहे थे। जब 1857 की क्रांति की ज्वाला मेरठ से भड़की तो उसके तीन दिन में ही बिजनौर में क्रांतिकारियों ने बिजनौर की ओर कूच कर दिया थाा। क्रांतिकारियों ने पहले जेल पर हमला कर वहां 314 कैदियों को छुड़ा लिया। इससे घबराए अंग्रेजों ने बिजनौर कोषागार में रखा खजाना बचाने के लिए उसे कलक्ट्रेट में ही एक कुएं में डाल दिया। क्रांति से जुड़ी इसकी पूरी कहानी जिला गजेटियर में दर्ज है, जो बिजनौर में क्रांति की गौरवगाथा को अपने में समेटे हुए है।
जिला गजेटियर में दर्ज है कि 13 मई, 1857 को बिजनौर तक खबर पहुंची कि मेरठ में स्वतंत्रता के लिए एक संगठित संघर्ष शुरू हो गया है, जिसका असर बिजनौर तक पहुंच गया है। जिलेभर में क्रांतिकारी एकत्रित हो रहे हैं। 16 मई को बिजनौर से 8 मील के दायरे में परगना दारानगर के झाल और ओलेंडा गांव में उपद्रव हो गया। इसके बाद शाहबाजपुर खद्दर गांव पर भी हमला हो गया। दस दिन बाद यह क्रांति बड़ा रूप ले चुकी थी। क्रांतिकारियों ने 21 मई को नगीना में तहसील के खजाने से दस हजार रुपये लूट लिए थे।
जिला गजेटियर में दर्ज है कि नगीना में खजाना लूटने के बाद बिजनौर में जेल पर क्रांतिकारियों ने हमला कर दिया। इसमें गार्ड राम स्वरूप ने क्रांतिकारियों की मदद की और दोपहर के समय 341 कैदियों को छुड़ा लिया। मजिस्ट्रेट एलेग्जेंडर शेक्सपियर, संयुक्त मजिस्ट्रेट के साथ कैदियों का पीछा करने लगे। उन्होंने जेल से भागे कैदियों और क्रांतिकारियेां पर सीधी फायरिंग शुरू करा दी। इसमें सात कैदियों की मौत हो गई, जबकि अंग्रेजों ने 126 को पकड़ लिया। बाकि बचे 215 कैदी गंगा खादर के रास्ते फरार हो गए। वहीं जेल पर हमला होने के बाद अंग्रेज अफसरों को कलक्ट्रेट में बने कोषागार में रखा खजाने के लूटने का डर सताने लगा था। अंग्रेजों ने नकदी और कीमती सामान को कलक्ट्रेट में ही बने एक गहरे कुएं में फेंक दिया था।