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‘ अल्लाह की इबादत करने की रात है शब-ए-बरात’

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‘ अल्लाह की इबादत करने की रात है शब-ए-बरात’
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नजीबाबाद। शब-ए-बरात इबादत की वह रात है जिसमें अल्लाह ताला बंदों की मुरादों को पूरी करता है। गुनाहों को माफ करता है। दिल से इबादत करने वालों पर अल्लाह की रहमतें बरसतीं हैं। उलमा कोविड गाइडलाइन के पालन के साथ इबादत करने की सलाह देते हैं।
मौलाना शम्सुद्दीन नोमानी कहते हैं कि शब-ए-बरात पर बंदा अल्लाह के सामने जब हाथ उठाकर बुराइयों से दूर होने, गुनाहों को माफ करने, नेकियों को अमल में लाने का अहद करता है तो अल्लाह बंदे के गुनाहों से माफी देकर उसकी जिंदगी को संवार देता है।
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मौलाना याहिया अंसारी कहते हैं कि शब के मायने हैं रात और बरात के मायने हैं बरी होना। इस रात की गई इबादत अफजल होती है। अल्लाह की रहमतें बरसतीं हैं यानी इबादत कर अल्लाह की रहमतें हासिल करने की शब-ए-बरात ऐसी रात है, जिसमें गुनाहों से निजात मिलती है।
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मौलाना मुफ्ती अरशद फरमाते हैं कि शब-ए-बरात पर शोर-शराबा मुनासिब नहीं यह सिर्फ और सिर्फ अल्लाह से लौ लगाने, ज्यादा से ज्यादा इबादत करने और अपने और दुनिया के लोगों की खुशहाली के लिए दुआ करने की रात है। दुनिया से रुख्सत हो चुके लोगों की मगफिरत और बीमारों की शिफा के लिए दुआ करने की अफजल रात है। मौलाना लियाकत हुसैन ने बताया कि शब-ए-बरात पर आतिशबाजी करना मुनासिब नहीं। शाबान के महीने की यह साल में आने वाली एक ऐसी रात है जिसमें इबादत के जरिये बंदा अल्लाह की रहमतें और खुशनूदी हासिल करता है।
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