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अस्करीपुर के रिक्खी सिंह ने तिरंगे की शान में दे दी थी जान

Fri, 26 Jan 2018 12:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
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शहीद रिक्खी सिंह की प्रतिमा। - फोटो : अमर उजाला
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नूरपुर में आजादी के आंदोलन में जान गंवाने वाले गांव अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह की नूरपुर में प्रतिमा लगाए जाने की मांग आजादी के 70 वर्ष बीतने के बाद अब जाकर पूरी हुई है। शुक्रवार को गणतंत्र दिवस के अवसर पर धामपुर चौक पर बनी उनकी प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। शहीद रिक्खी सिंह के इकलौते पुत्र रामस्वरूप सिंह को अफसोस है कि आजादी के बाद और अब के माहौल में बहुत अधिक अंतर आ चुका है। युवा पीढ़ी आजादी की कीमत भूल चुकी। पहले नूरपुर में 16 अगस्त को लगने वाले शहीद मेले में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए जहां भारी भीड़ उमड़ती थी वहीं अब यह मेला मात्र औपचारिकता बनकर रह गया है। 
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गांव अस्करीपुर निवासी शहीद रिक्खी सिंह के पुत्र रामस्वरूप सिंह, डा. योगेश शर्मा, कन्हैया सिंह, धर्मसिंह के मुताबिक गांधी जी के ‘करो या मरो’ नारे के बाद 11 अगस्त 1942 को नूरपुर क्षेत्र के क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक हुई जिसमें 16 अगस्त को नूरपुर थाने पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया गया। 16 अगस्त को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक क्रांतिकारियों का एक जत्था फीना की ओर से क्षेत्रपाल सिंह के नेतृत्व में, दूसरा जत्था गोहावर की ओर से परवीन सिंह, रिक्खी सिंह एवं नारायन सिंह के नेतृत्व में और तीसरा जत्था ताजपुर की ओर से डॉ. राजकुमार के नेतृत्व में नूरपुर पहुंचा। पुलिस ने फीना वाले जत्थे को नूरपुर से बाहर ही लाठीचार्ज कर रोकने का प्रयास किया पर किसी तरह करीब 15 हजार लोग नूरपुर थाने तक पहुंच गए। 

नूरपुर के वैद्य जगनंदन प्रसाद एवं ताजपुर के डॉ. राजकुमार ने थानेदार से बात कर शांतिपूर्ण ढंग से थाने पर झंडा फहराने की बात कही। थानेदार ने उनकी बात नहीं मानी और भीड़ पर लाठीचार्ज करा दिया। भीड़ के वहां से न हटने पर पुलिस ने गोली चला दी। इस दौरान थाने पर झंडा फहराने का प्रयास कर रहे गांव गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह मौके पर ही शहीद हो गए। अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह ने जेल के अस्पताल में दम तोड़ा और पैर में गोली लगने से घायल हुए ढेली अहीर निवासी मुंशीराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। 
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नूरपुर प्रदर्शन की घटना में करीब 32 लोग गिरफ्तार किए गए। छह हजार रुपये सामूहिक जुर्माना लगाया गया। गिरफ्तार लोगों को लोअर कोर्ट से छह-छह वर्ष कारावास की सजा मिली। अपील के बाद सेशन कोर्ट से 16 व्यक्ति छूट गए शेष को दो-दो वर्ष की सजा हुई। फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई, जिसके बाद अप्रैल 1944 में सभी की रिहाई हुई।

युवा पीढ़ी आजादी की कीमत भूल चुकी : रामस्वरूप
नूरपुर। नूरपुर थाने पर झंडा फहराने के दौरान पुलिस की गोली लगने से शहीद हुए रिक्खी सिंह के इकलौते पुत्र रामस्वरूप सिंह गांव में रहते हैं। रिक्खी सिंह की शहादत के समय रामस्वरुप सिंह की उम्र करीब 10 वर्ष थी। उनका कहना है कि पिता की शहादत की कुछ धुंधली यादें आज भी उनके जेहन में है। पिता रिक्खी सिंह पर अंग्रेजों से आजादी पाने का जुनून सवार था। उनकी बड़ी बहन भगवती देवी की पिता शादी कर चुके थे, जबकि वह और छोटी बहन रामकली छोटे थे। उन्होंने बताया कि गांव व परिवार वालों पर पुलिस का इतना खौफ था कि उनके पिता रिक्खी सिंह का शव लेने भी कोई नहीं गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने कई दिन तक बिजनौर से उनके शव को पुलिस को नहीं उठाने दिया। बाद में पुलिस ने झूठ बोलकर शव उठाया और उनका अंतिम संस्कार किया। रामस्वरूप सिंह ने बताया कि  पहले उनके पिता की याद में नूरपुर में लगने वाले शहीद मेले में लोगों का सैलाब उमड़ता था और भारी संख्या में महिला-पुरुष शहीद स्तंभ पर दीप जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते थे, लेकिन अब यह मेला मात्र औपचारिकता बनकर रह गया है।

प्रतिमा लगाने का सपना पूरा हुआ
नूरपुर। आजादी के 70 वर्ष से अधिक बीतने के बाद अब जाकर शहीद रिक्खी सिंह की प्रतिमा लगने का उनके परिजनों का सपना पूरा हुआ है। शुक्रवार को धामपुर तिराहे पर लगाई गई उनकी प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। रिक्खी सिंह के पुत्र पिता की प्रतिमा की स्थापना होने पर बहुत खुश नजर आ रहे हैं। उनका कहना है अब जकार उनका सपना पूरा हुआ है।
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