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महंगे कोर्स कर रहे अभिभावकों की जेब ढीली

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महंगे कोर्स कर रहे अभिभावकों की जेब ढीली
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बिजनौर। कोरोनाकाल के बाद अब स्कूल, कॉलेजों में शिक्षण कार्य चल रहा है। वर्तमान समय में विद्यालयों में नामांकन की प्रक्रिया चल रही है। अभिभावक बच्चों को प्रवेश दिलाकर उन्हें कोर्स, यूनिफॉर्म दिला रहे हैं। स्कूलों की फीस के बाद महंगे कोर्स अभिभावकों की जेब ढीली कर रहे है। कई स्कूलों ने इस साल अधिकांश क्लास का कोर्स ही बदल दिया है। गत शैक्षिक सत्र में चले लेखकों की जगह दूसरे लेखकों की किताबें लगा दी हैं। कमीशन के खेल में स्कूल संचालकों के इस कदम से अभिभावकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अप्रैल माह से निजी, सरकारी सभी स्कूलों में प्रवेश की प्रक्रिया चल रही है। कुछ अभिभावक परिचितों से पुरानी किताब लेकर बच्चों को पढ़ाना चाहते है, लेकिन लेखक बदलने से किताबें ही बदल गई हैं। मजबूरन अभिभावकों को महंगा कोर्स खरीदना पड़ रहा है। हैरत की बात यह है कि अधिकांश स्कूलों ने अपनी एक दुकान चिह्नित कर रखी है। उन स्कूलों का कोर्स वहां पर ही मिलता है।
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क्या बोले अभिभावक
कोरोना के कारण आम आदमी के रोजगार छूट गए। ऐसे में बच्चों के कोर्स महंगे होने से पढ़ाई और घर का संचालन कठिन हो रहा है। सभी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें चलनी चाहिए। कोर्स और फीस में बढ़ोतरी अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है - राहुल राठी
निजी स्कूलों के संचालक मनमर्जी कर रहे हैं। कमीशन खोरी के चलते कोरोनाकाल में कोर्स बदल रहे हैं, काफी स्कूलों ने फीस में बढ़ोतरी कर दी है। सभी स्कूलों में फीस और पुराना कोर्स को ही चालू रखना चाहिए था और कोर्स में एनसीईआरटी की किताबें शामिल करनी चाहिए
- जया अग्रवाल, उपाध्यक्ष अभिभावक संघ
निजी स्कूल संचालकों की मनमानी का दंश अभिभावक झेल रहे हैं। अच्छी शिक्षा दिलाने के लालच में अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। कोरोना में अभिभावक किन परिस्थिति में बच्चों को पढ़ा रहा है। इस पर भी स्कूल संचालकों को सोचना चाहिए
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- नृपेंद्र देशवाल, अध्यक्ष अभिभावक संघ
सभी स्कूलों को एनसीईआरटी की किताबें ही कोर्स में लगानी चाहिए। पाठ्यक्रम में जरूरत को देखते हुए एक-दो प्राइवेट लेखकों की किताबें लगाते हैं, बार-बार किताबें नहीं बदलना चाहिए। इस मामले को दिखवाया जाएगा
- जयकरन यादव, बीएसए
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