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एक नई दुनिया बसाकर सुर्ख़रू वो ही हुआ

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‘एक नई दुनिया बसाकर सुर्खरू वो ही हुआ’
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बिजनौर। नज़्मों और गजलों की दुनिया में जिले का नाम रोशन करने वाले महबूब सुभानी (पुत्तन भाई) उर्फ वली बिजनौरी दुनिया से रुखसत हो गए। उनके जाने से उनकी शायरी सुनने वालों में गम पसरा है। वे वली बिजनौरी के कलामों को पढ़कर उन्हें याद कर रहे हैं। उनका निधन तीन दिन पहले दिल्ली के ग्रेटर कैलाश-2 में अपने बेटे के आवास पर हुआ।
1925 में बिजनौर में अब्दुल वली के परिवार में जन्मे वली बिजनौरी ने किराना दुकान करने का अपना पैतृक काम संभाला। उन्हें शेरों शायरी का शौक़ था। इस शौक़ को उन्होंने जीवन के 50वें साल में कलम से पिरोना शुरू किया। उन्होंने कई शेर, नज़्म, गजलें लिखीं। अपने समय के शायरों में वे बड़ा नाम बन गए। उनकी नज़्में सभी के होठों पर चढ़ गईं। बड़ी मैगजीन में उनकी नज़्में छपीं। रेडियो, टीवी पर भी उन्होंने अपने कलाम पेश किए। उन्हें लाल किले में होने वाले मुशायरे में भी कलाम पेश करने का मौका मिला। उन्होंने अपनी कोई पुस्तक तो प्रकाशित नहीं कराई, लेकिन उनके समय में कोई ऐसी बड़ी मैगजीन नहीं थी, जिसमें उनके नाम की नज़्में न छपी हो।
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उनके बेटे डॉ. मोहसिन वली राष्ट्रपति के चिकित्सक भी रह चुके हैं। वली बिजनौरी के इंतकाल से उनके चाहने वालों को दुख पहुंचा है। उन्होंने वली बिजनौरी के घर जाकर रंजो गम का इजहार किया। जिले के प्रसिद्ध शायर शकील बिजनौरी ने बताया कि वली बिजनौरी जिंदादिल शायर और हंसने हंसाने वाले आदमी थे। वे अपनी रूमानी गजलों से सभी को अपना बना लेते थे। वे जहां दोस्त बहुत अच्छे थे वहीं वे इंसान भी बहुत अच्छे थे। अब उनके दोस्त उनके बगैर तनहाई महसूस करेंगे। उन्होंने अपने दोनों बेटों डॉ. मोहसिन वली व डॉ. तारिक वली को बहुत मेहनत से पढ़ाया और उनको ऐसे संस्कार दिए कि वे राष्ट्रपति के चिकित्सक की हैसियत से हिंदुस्तान ही क्या बाहर भी जाने पहचाने जाते हैं।
वली बिजनौरी की गजल
हम भी खुश थे अजनबी लोगों से करके दोस्ती
एक नई दुनिया बसाकर सुख़ॱररू वो ही हुआ।
ख़ाक सहरा की उड़ाकर सुख़ॱररू वो ही हुआ।
फिर मुझे अपना बनाकर सुख़ॱररू वो ही हुआ।
कामरां कुछ कम न थे हम भी सुनाके हाले दिल।
हम से अपना ग़म छिपाकर सुख़ॱररू वो ही हुआ।
मुजतरिब हम भी बहुत थे ढूंढ़कर छोड़ा उसे।
जब्तके मानी बताकर सुख़ॱररू वोही हुआ।
हम भी खुश थे अजनबी लोगों से करके दोस्ती
एक नई दुनिया बसाकर सुख़ॱररू वोही हुआ।
की पजिराई मेरी उसने अजब अंदाज से।
आग होठों पर सजाकर सुख़ॱररू वोही हुआ।
हम भी तनहा एक अकेली शाख़ पर बैठे रहे।
आशियां अपना बनाकर सुख़ॱररू वोही हुआ।
बिन बुलाएं हम भी जा बैठे न जाने क्यों वहीं
अपनी महफिल से उठाकर सुख़ॱररू वोही हुआ।
(तारीखे अदब जिला बिजनौर से साभार )
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