फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोरोना में ठप हुआ हथकरघा उद्योग

विज्ञापन
नहटौर में मशीन पर कपड़ा बनाता कारीगर। - फोटो : BIJNOR
विज्ञापन
कोरोना में ठप हुआ हथकरघा उद्योग
विज्ञापन

बिजनौर। कभी उत्तर भारत में खादी के लिए मशहूर जिले का हथकरघा उद्योग नई तकनीक अपनाने के बाद भी पहले के बराबर रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है। मोटी खद्दर से फाइन खादी बनाने का उद्योग में परिवर्तन तो आया, लेकिन ग्राहक पहले की तरह जुड़े नहीं रह सके। कोरोना काल ने व्यापार को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। अब व्यापारी कोरोना काल खत्म होने की आस में ही व्यापार को किसी तरह आगे बढ़ा रहे हैं।
जिले में हथकरघा का काम कभी काफी तादाद में होता था। 500 से अधिक जगह पर हथकरघा उद्योग चलता था। इसकी सबसे ज्यादा इकाइयां नहटौर में थीं। इनमें हजारों लोग काम करते थे। यहां पर बनने वाला कपड़ा मोटा होता था। इसे खद्दर भी कहा जाता था। इस खादी की उत्तर भारत व विदेेशों में बहुत मांग रहती थी। यहां बनीं पैंट-शर्ट, कुर्ते पायजामे, सलवार-सूट के कपड़े खूब बिकते थे। बदलाव आया तो हथकरघा उद्योग ने भी इसे अपनाया और धीरे धीरे इसकी जगह पावर हैंडलूम ने ले ली। पावर हैंडलूम की भी करीब 400 इकाई स्थापित र्हुइं।
विज्ञापन

उद्योग ने तकनीक अपनाई और कपड़े की गुणवत्ता में पहले से सुधार आया। खादी की गुणवत्ता सुधरी और ये फाइन खादी बन गई। लेकिन दूसरे जिलों में भी ज्यादा इकाई चलने लगीं। साथ ही ब्रांडेड कंपनियों के कपड़ों के आगे नहटौर की फाइन खादी नहीं टिकी। रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी। कोरोना की वजह से लोकल की खपत और विदेशों से मिलने वाले ऑर्डर दोनों ही बहुत कम हो गए हैं।
विज्ञापन

स्कार्फ की अब भी डिमांड
नहटौर में बनने वाले स्कार्फ की आज भी काफी डिमांड है। यह महिलाओं में खासा मशहूर है। विदेशों में भी इसकी सप्लाई होती है। इससे ही अब रोजगार चल रहा है। पावरलूम कारोबारी हाजी मकसूद के अनुसार कारोबार इस वक्त बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहा है। कोरोना के बाद से कपड़े की डिमांड मात्र 25 से 30 प्रतिशत ही रह गई है। सरकार की ओर से पहले निर्यात करने पर 18 प्रतिशत सब्सिडी मिलती थी अब यह भी तीन से चार प्रतिशत ही रह गई है। 100 करोड़ के टर्नओवर का कारोबार अब बहुत सिमट गया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें