हिंदी का गौरव बढ़ा रहे गिरिराज शरण अग्रवाल
बिजनौर। वर्धमान कॉलेज बिजनौर में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल ने हिंदी साहित्य को ऊंचाइयों पर पहुंचाने में भरपूर योगदान दिया। उन्होंने करीब 100 पुस्तकों का लेखन तथा संपादन किया है। कई विश्वविद्यालयों में उनके साहित्य पर शोध कार्य हो चुका है और शोध कार्य वर्तमान में चल रहे हैं। डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल को राष्ट्रीय तथा प्रदेश स्तर पर दर्जनों सम्मान प्राप्त हुए हैं।
डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल का जन्म 1944 में संभल में हुआ था, लेकिन उनका कार्य क्षेत्र बिजनौर ही रहा। वह बिजनौर में वर्धमान कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे। उन्होंने हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में रचनाएं कीं। उन्होंने पद्य, गद्य, कविता, नाटक, गजल लिखे। इसके अतिरिक्त उन्होंने बाल साहित्य भी खूब लिखा। उनके द्वारा लिखे गए बच्चों के नाटकों का मंचन कई विद्यालयों में किया गया। उनके द्वारा लिखी गई प्रमुख रचनाओं में सन्नाटे में गूंज, बाबू झोलानाथ, समय एक नाटक, भीतर शोर बहुत है, राजनीति में गिरगिटवाद, दंगे: क्यों और कैसे, विश्व आतंकवाद : क्यों और कैसे, हिंदी पत्रकारिता: विविध आयाम, आओ अतीत में चलें, मानवाधिकार : दशा और दिशा, गजल और उसका व्याकरण, मौसम बदल गया कितना, बच्चों के हास्य-नाटक, बच्चों के रोचक नाटक, ग्यारह नुक्कड़ नाटक, नारी: कल और आज, पर्यावरण : दशा और दिशा, हिंसा : कैसा-कैसी, रोशनी बनकर जिओ, वादविवाद प्रतियोगिता : पक्ष और विपक्ष , मंचीय व्यंग्य एकांकी, मेरे इक्यावन व्यंग, शिकायत न करो तुम, अक्षर हूं मैं, मेरी हास्य-व्यंग्य कविताएं, आदमी है कहां आदि है।
वह शोध दिशा नाम की पत्रिका के संपादक हैं। इस पत्रिका का वर्तमान हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है। डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल का कहना है कि हिंदी को पढ़ाने के साथ-साथ समझाने की भी आवश्यकता है। हिंदी के लिए बच्चों के मस्तिष्क में इसी प्रकार रुझान पैदा करने होंगे, जिस प्रकार हम अंग्रेजी के लिए करते हैं। डॉ. गिरिराज सिंह अग्रवाल को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त उन्हें डॉ. रतन लाल शर्मा स्मृति सम्मान, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा सम्मान, अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन उज्जैन द्वारा सहस्राब्दी सम्मान, सरस्वती श्रीसम्मान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दो दर्जन से अधिक पुरस्कार मिल चुके हैं।