कभी बिजनौर नगर से होकर बहती थी गंगा
बिजनौर। आज गंगा दशहरा है। बिजनौर और आसपास के लोग गंगा स्नान के लिए गंगा बैराज जाते हैं और यहीं पर शवों का अंतिम संस्कार करते हैं। आज से 25-30 साल पहले तक विदुर कुटी गंगा स्नान के लिए जाते थे। लेकिन आज से लगभग 200 साल पहले बिजनौर शहर में ही गंगा बहती थी और बिजनौर वासी यहीं स्नान करते थे। अब गंगा की धारा दस किलोमीटर से ज्यादा पीछे जा चुकी है।
बिजनौर के पुराने शहर में काजीपाड़ा, जाटान आदि बहुत गहराई पर बसे मोहल्ले हैं। जबकि शास्त्री चौक से घंटाघर पुरानी तहसील होते हुए सदुपुरा जाने वाले रास्ते से पूरब की साइड में बसे मोहल्लों का तल सामान्य है। अचारजान में बाल कृष्ण खन्ना की कोठी से दो साइड को रास्ता गया है। इन रास्तों का ढाल 40 से 45 फीट तक है। पुराने लोग बताते रहे हैं कि कभी यहां गंगा बहती थी। ये ढाल गंगा के खोले (ढाल वाला तट) हैं। बताते हैं कि कभी गंगा की धार भरत विहार, नुमाईश ग्राउंड, काजीपाड़ा होते हुए बहती थी। ये ढाल गंगा के पुराने मार्ग को दर्शाता है। भगत सिंह चौक से काजीपाड़ा, बालकृष्ण खन्ना की कोठी के दोनों साइड के ढाल, सरस्वती विद्या मंदिर से आगे का ढाल, रम्मू के चौराहे के पास से दाईं ओर नीचे जाने वाला ढाल बताता है कि कभी गंगा यहां तक वही है। ये गंगा के खोले हैं। बिजनौर में गंगा सन् 1800 के पासपास तक बहती थी। इसके बाद उसकी धार दूर होती चली गई। आज यह बिजनौर से 12 किलोमीटर दूर बहती है। इस एरिया के ऊपर कई पुराने छोटे छोटे मंदिर हैं। वैसे ही मंदिर जैसे गंगा के किनारे होते हैं। रुड़की में 1825 के आसपास गंग नहर बनी। इसी दौरान बालावाली में रेलवे पुल बना। इससे गंगा की धार बंध गई। गंज के केवलानंद आश्रम के स्वर्गीय स्वामी सुखानंद जी अपने शिष्यों को बताते थे कि उन्होंने गंगा में चलते बड़े बड़े जहाज देखे हैं।
जामा मस्जिद के पास आ जाता था गंगा का पानी
काजीपाड़ा के रहने वाले खालिद असरार बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने मकान की जमीन 1872 में खरीदी। उससे पहले गंगा काजीपाड़ा से पीछे जा चुकी थी। वे कहते हैं कि काजीपाड़ा की जामा मस्जिद भी ढाल से ऊपर इसलिए बनी है क्योंकि नीचे गंगा का पानी आ जाता था। अचारजान निवासी संजय खन्ना एडवोकेट बताते हैं कि उनके दादा जी बताते थे कि उनकी कोठी के पीछे गंगा के खोले हैं। वे कहते हैं कि उनकी कोठी के सामने की धर्मशाला बहुत ऊंची उठाकर इसलिए बनाई गई थी क्योंकि यहां तक गंगा का पानी आ जाता था। जाटान के रहने वाले समाचारपत्र वितरक दिनेश शर्मा कहते हैं कि उनके घर से मुख्य शहर में जाने के लिए 40 -45 फीट की ऊंचाई चढ़नी पड़ती है। वे कहते हैं कि छुटपन में घर के सामने जब वे खेलते थे तो मिट्ठी के नीचे गंगा का रेत निकलता था।
बिजनौर के इतिहास के बड़े जानकार शकील बिजनौरी कहते हैं कि कि आज से लगभग 200 साल पूर्व गंगा बिजनौर के पुराने शहर से होकर बही है। पुुरानी तहसील चौराहे से पश्चिम का ढाल बताता है कि ये गंगा के खोले हैं। इस ढाल के ऊपर के पुराने छोटे छोटे मंदिर गंगा किनारे बने मंदिर हैं। पुरानी तहसील से आगे एक रास्ता सदुपुरा को गया है। एक जाटान को। जाटान के ढाल से गंगा आगे बढ़ गई। इससे सदुपुरा और जलालपुर घाट वाले मार्ग को प्रभावित नहीं किया।
चामुंडा मंदिर से शुरू होती थी गंगा की रेती
जाटान के रहने वाले बिजली विभाग से सेवानिवृत्त बिजेंद्र पाल सिंह बताते हैं कि मुहल्ले के वृद्ध कढेरा सिंह बताते थे कि वे इस ढाली के कुछ आगे गंगा में खूब नहाए हैं। पहले यहां गंगा बहती थी। मोहल्ला जाटान निवासी 85 वीरेंद्र अग्रवाल सराफ बताते हैं कि वे चार पीढ़ियों से जाटान में रह रहे हैं। उनके पिता बताते थे कि जहां उनका घर है वहां कभी गंगा बहती थी। उनका घर गंगा के तट जैसे टीले पर दस फीट की ऊंचाई पर है। उनके मकान से भी ऊपर तक ये टीले थे। उनके अनुसार जब वे छोटे थे तो गांव गोकलपुर वाली जगह में गंगा बहती थी। वह वहां खूब नहाते थे। जहां चामुंडा मंदिर है वहीं से गंगा की रेती शुरू हो जाती थी। शीतला माता मंदिर के पास गंगा का तट था। शीतला माता मंदिर में खड़ा पिलखन गंगा तट पर था। वहां रखी शिवलिंग व नंदी की मूर्ति भी गंगा तट से ही मिली थीं। अब तो गंगा की धारा वहां से कई किलोमीटर दूर खिसक चुकी है। जाटान निवासी डॉ. दीपक विश्नोई बताते हैं कि जहां उनका घर है उसके सामने कभी श्मशान घाट था। यहां गंगा के किनारे शवों का अंतिम संस्कार होता था। शहर तो बहुत थोड़ा सा घंटाघर की ओर ही था। धीरे धीरे गंगा की धारा पीछे की ओर गई तो यहां शहर बस गया।
ीरेंद्र अग्रवाल सर्राफ।- फोटो : BIJNOR
दिनेश शर्मा।- फोटो : BIJNOR
शकील बिजनौरी।- फोटो : BIJNOR
खालिद असरार।- फोटो : BIJNOR
संजय खन्ना एडवोकेट।- फोटो : BIJNOR
बृजेंद पाल सिंह।- फोटो : BIJNOR