फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पहले खुद को संभाला फिर 23 हजार दिव्यांगों की बैसाखी बने जयप्रकाश

विज्ञापन
विज्ञापन
पहले खुद को संभाला फिर 23 हजार दिव्यांगों की बैसाखी बने जयप्रकाश
विज्ञापन

बिजनौर। तकदीर के खेल से निराश नहीं होते, जिंदगी में ऐसे कभी उदास नहीं होते, हाथों की लकीरों पर क्यों भरोसा करते हो, तकदीर उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते। इन लाइनों को चरितार्थ कर दिखाया है दोनों पैर से दिव्यांग जयप्रकाश ने। खुद के लिए कृत्रिम अंग लेने दिल्ली जाना पड़ा और परेशानियां झेली तो अपने साथ साथ दूसरे दिव्यांगों की परेशानी को दूर करने की ठान ली। 2003 में खुद की जमा पुंजी से कृत्रिम अंग बनाने शुरू किया और जिले के दिव्यांगों को निश्शुल्क कृत्रिम अंग बांटे। मन नहीं माना तो आसपास के जिलों सहित उत्तराखंड तक के दिव्यांगों को कृत्रिम अंग बांटने के लिए सौ से ज्यादा दानदाताओं को जोड़ा। अब तक जयप्रकाश 23 हजार से ज्यादा दिव्यांगों को कृत्रिम अंग बांट चुके हैं।
गांव कुम्हारपुरा निवासी जयप्रकाश प्रजापति (48) पुत्र शेखचंद दोनों पैरों से दिव्यांग हैं और बिना बैसाखी चल नहीं पाते। जय प्रकाश अपने संघर्षों को याद करते हुए बताते हैं कि वह वर्ष 2000 के आसपास दिल्ली में महावीर विकलांग सहायता समिति से अपने लिए कृत्रिम अंग लेने जाते थे। वहां पर पहले नाप देने जाना होता था, फिर उन्हें लेने। कभी-कभी इसके लिए दिल्ली के तीन से चार चक्कर लगाने पड़ जाते थे। जयप्रकाश ने कहा कि इस दौरान जो पीड़ा सहनी पड़ी, उससे मैने दूसरे दिव्यांग साथियों की पीड़ा को भी अनुभव किया। बस फिर क्या था, दिल्ली में जिस संस्था में जाता था, वहां कृत्रिम अंग बनते देख उन्हें बनाना भी सीख लिया। वर्ष 2003 में खुद घर पर कृत्रिम अंग बनाने शुरू किए और साथी दिव्यांगों को बांटे। इसके बाद दूसरे साथी दिव्यांगों को इसका पता चला तो उन्होंने भी मांग की, फिर पैसे की कमी आई तो जेपी विकलांग शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के नाम से संस्था बनाई और दानदाताओं से संपर्क किया। एक के बाद एक लोगों ने मदद शुरू की, जिसके बाद कृत्रिम अंग बनाने का काम तेज हो गया। 2003 से अब तक जयप्रकाश प्रजापति ने अपनी संस्था के माध्यम से करीब 23 हजार दिव्यांगों को निशुल्क कृत्रिम अंग उपलब्ध करा दिए। जयप्रकाश कहते हैं कि मैं अपनी रोजीरोटी के लिए रेडीमेट कपड़ों की दुकान चलाता हूं। (संवाद)
विज्ञापन

शादी के बाद मिलकर बनाए कृत्रिम अंग
जयप्रकाश प्रजापति कहते हैं कि उनकी शादी वर्ष 2009 में उर्मिला देवी से हो गई। वह भी एक पैर से दिव्यांग हैं। इसके बाद मेरा प्रयास और तेज हो गया। पति पत्नी दोनों ने मिलकर चार और लोगों को कृत्रिम अंग बनाने का प्रशिक्षण दिया, ताकि ज्यादा कृत्रिम अंग तैयार हो सकें। अब वह खुद और अन्य चार लोग कृत्रिम अंग तैयार कर रहे हैं।
यूपी के साथ उत्तराखंड तक पहुंचाए कृत्रिम अंग, निशुल्क होती है रिपेयरिंग
जयप्रकाश बताते हैं कि बिजनौर के दिव्यांगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने के बाद दूसरे जिले के दिव्यांग साथियों ने भी संपर्क साधा। इसके बाद हमने वहां भी कैंप लगाकर कृत्रिम अंगों का वितरण किया। अब तक बिजनौर के अलावा कन्नौज, इटावा, सिद्धार्थनगर, बरेली, संभल, अमरोहा, मेरठ और उत्तराखंड में पौड़ी जिले में कैंप लगाकर दिव्यांगों को कृत्रिम अंग बांटे हैं। इसके बाद कृत्रिम अंगों की रिपेयरिंग भी जयप्रकाश अपने यहां निश्शुल्क की कराते हैं।
कौन-कौन से कृत्रिम अंग हो रहे तैयार
जयप्रकाश प्रजापति अपने यहां बैसाखी, कैलीपर पोलियो से ग्रस्त पैर के लिए, व्हीलचेयर, ब्लाइंड स्टिक, वॉकर तैयार कराते हैं। उनका कहना है कि यह ऐसे कृत्रिम अंग हैं, जो सबसे ज्यादा उपयोग में आते हैं। हम प्रयास कर रहे हैं कि सभी दिव्यांग साथियों के लिए सभी तरह के कृत्रिम अंग तैयार करा सकें।
दिव्यांगों को रोजगार से भी जोड़ा
यह प्रयास केवल कृत्रिम अंग तक ही सीमित नहीं रहा था, जयप्रकाश प्रजापति ने इसे दिव्यांगों को रोजगार दिलाने तक आगे बढ़ाया। जयप्रकाश प्रजापति ने बताया कि हमने कैंप में चंदा देने वालों की मदद से दिव्यांगों को सिलाई मशीन, वजन करने वाली मशीन भी उपलब्ध कराई है। उनका कहना है कि कुछ दिव्यांगों के सामने रोजीरोटी की समस्या बन जाती है, इसलिए उन्हें यह उपलब्ध कराई गई थी। ताकि वह अपना जीवन यापन कर सकें।
प्रेरणा देने वाला काम कर रहे जयप्रकाश : अर्जुन सिंह
गांव खेड़ा निवासी अर्जुन सिंह का कहना है कि जेपी प्रशिक्षण संस्थान के संस्थापक जयप्रकाश सिंह दिव्यांग होने के बावजूद नि:स्वार्थ भाव से दिव्यांगों के लिए कृत्रिम अंग बनाकर सेवा करने में लगे हुए हैं। यह प्रेरणा से कम नहीं है।
विज्ञापन

सराहनीय कार्य किया : सुशील कुमार
कुम्हारपुरा गांव के सुशील कुमार कहते हैं कि जयप्रकाश ने इस काम में लंबा समय दिया है। वह जो दिव्यांगों के लिए कर रहे हैं, वह सराहनीय कार्य है। इससे पूरे समाज को प्रेरणा मिलती है कि कैसे खुद की परेशानी को देख दूसरों के दर्द का अंदाजा लगाया और फिर उसे दूर करने की ठान ली।

हल्दौर में कृत्रिम अंग बनाते दिव्यांग जयप्रकाश।- फोटो : BIJNOR

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें