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...फिर नहीं गए परदेस, घर ही ठहर गए 77 हजार मजदूर

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...फिर नहीं गए परदेस, घर ही ठहर गए 77 हजार मजदूर
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बिजनौर। पहले लॉकडाउन में तमाम बंदिशों के बीच मजदूर मुश्किलों को पार कर घर आए तो फिर यहीं के होकर रह गए। उन्होंने दूसरे जिलों या राज्यों में कामकाज करने के लिए जाना गवारा ही नहीं समझा। अब ये मजदूर अपने पास गांव देहात या शहर में ही काम करने लगे हैं। श्रम विभाग के आंकड़े यह तस्दीक करने के लिए काफी हैं। दरअसल कोरोना काल से अब तक 77 हजार मजदूरों ने पंजीकरण कराया है जो पहले गैर जनपदों या राज्यों में काम किया करते थे।
श्रम विभाग में जिलेभर के अप्रैल 2020 तक 2 लाख 64 हजार मजदूर पंजीकृत हुआ करते थे। मार्च 2020 में ही कोविड के चलते पहला लॉकडाउन लग गया था। इसके बाद से अचानक श्रम विभाग में मजदूरों के पंजीकरण में काफी उछाल आया। कोरोना काल में 77 हजार 716 लोगों ने अपना पंजीकरण कराया। जिसके चलते अब पंजीकृत श्रमिकों की संख्या 3 लाख 41 हजार 730 हो चुकी है। बताया जा रहा है कि पंजीकरण कराने वाले ये वो मजदूर हैं जोकि लॉकडाउन में तमाम दिक्कतों को झेलकर अपने घर आ पाए थे। ऐसा हुआ भी था कि दूसरे जिलों और प्रदेशों में काम करने वाले लोग कैसे अपने घर की तरफ पैदल ही चल पड़े। कोई साइकिल से आया था तो कोई ट्रकों में छुपकर। तमाम मामले ऐसे भी मिले कि लोग एंबुलेंस लेकर भी मुंबई जैसे शहरों से बिजनौर आ गए थे। उसके बाद वापस अपने जिले को छोड़कर नहीं गए। इसकी गवाही श्रम विभाग के आंकड़े देते हैं।
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गांव देहात में ही ढूंढ लिया काम
अपने पंजीकरण की सलाना फीस जमा करने के लिए श्रम विभाग के ऑफिस पहुंचे राशिद ने बताया कि वह पहले मुंबई में एक बेकरी में काम करता था। लॉकडाउन की दिक्कतों को देख अब जाने का मन ही नहीं करता है। उसने अब अपने कस्बे कोतवाली में ही राजमिस्त्री के साथ काम करने लगा है। कुछ योजनाओं का लाभ मिल जाए, इसके लिए पंजीकरण भी कराया है।
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लॉकडाउन में देखी सच्चाई : राजवीर
राजवीर सिंह ने बताया कि कोरोना काल में चंडीगढ़ काम करने गया था, लेकिन लॉकडाउन लगने की वजह से वापस अपने घर लौटना पड़ा। इस दौरान काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। जिसके बाद रोजी-रोटी के लिए अपने जिले को ही बेहतर समझा।
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बाहर से तो घर ही अच्छा : महेंद्र
श्रमिक महेंद्र का कहना है कि कोरोना काल में हमारा सब कुछ उजड़ गया था। हम दाने-दाने को तरस गए, पैसा कमाने की इच्छा से बाहर गए थे, लेकिन कोरोना की वजह से वापस घर लौटे। पैसे की कमी होने के कारण पैदल चलकर आए थे। देहरादून में भवन निर्माण में मजदूरी किया करता था, जब लौटा तो ठेकेदार ने भी पैसे नहीं दिए थे। अब अपने गांव में ही मनरेेगा या मकानों की चिनाई में काम कर लेता हूं।
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रियाद में करते थे ड्राइविंग, अब जाने का मन नहीं: आरिफ
मोहल्ला काजीपाड़ा निवासी मोहम्मद आरिफ सऊदी के रियाद शहर में फैमिली ड्राइवर का काम करते थे। दो साल में घर आना होता था। वर्ष 2020 में आना था, लेकिन कोरोना आया तो सभी फ्लाइट बंद हो गई। घर आने का मन था, लेकिन नहीं आ सका। पूरा एक साल लग गया, जब दोबारा फ्लाइट शुरू हुई तो घर लौटकर आया। करीब छह माह पहले ही बिजनौर अपने निवास पर आया। अब यहीं पर गाड़ी चला रहा हूं, अब बाहर जाने का मन नहीं करता।
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