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राष्ट्रीय दिव्यांगता दिवस पर विशेष

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खुद पर भरोसा कर दिव्यांगता को दी मात
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बिजनौर/बरूकी। दिव्यांगता केवल शरीर की होती है इरादों में नहीं। जिले के कुछ दिव्यांगों ने इस बात को साबित करके दिखाया है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। दिव्यांग प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर ये दूसरों को भी प्रेरणा दे रहे हैं। इन युवाओं को शासन स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है।
गांव जलालपुर काजी निवासी विक्कर ने दिव्यांगता को कभी बोझ नहीं बनने दिया। बचपन में गांव के बच्चों को क्रिकेट खेलता देखकर उनके अंदर भी क्रिकेट खेलने का जुनून पैदा हुआ। विक्कर ने पहले गांव के स्थानीय युवाओं के साथ खेलना शुरू किया और फिर दिव्यांगों की टीम में शामिल हुए। वह राष्ट्रीय स्तर पर कई मैच खेल चुके हैं। विक्कर का चयन भारत व पाकिस्तान के बीच होने वाले दिव्यांगों के एक दिवसीय क्रिकेट मैच के लिए भी हुआ था, लेकिन किसी वजह से वह मैच नहीं हो पाया था। विक्कर घर पर सिलाई करके अपना खर्च खुद उठाते हैं। वह सरकारी नौकरी पाने के भी प्रयास में लगे हैं।
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गांव बागड़पुर निवासी सुमित कुमार भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैच खेल चुके हैं। वह बांग्लादेश के खिलाफ चुनी टीम में भी रह चुके हैं। सुमित को जिम जाने का भी शौक है। सुमित ने पढ़ाई में भी बहुत मेहनत की। वह केंद्रीय विद्यालय मेरठ कैंट में शिक्षक हैं। अब सुमित बाकी दिव्यांगों को आगे बढ़ने के लिद प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसके लिए सुमित ने वी केन/हम कर सकते हैं नाम से एक संस्था बनाई है। इसके जरिए अनेक खेल प्रतियोगिताएं आदि कराई जा रही हैं।
गांव स्वाहेड़ी निवासी आकांक्षा को शूटिंग का शौक चढ़ा। बैंक में कार्यरत आकांक्षा को बैंक व घर से नेहरू स्पोर्ट्स स्टेडियम आने जाने की दिक्कत थी तो उसने घर पर ही शूटिंग रेंज खोल ली। आकांक्षा राष्ट्रीय स्तर पर अनेक मेडल जीत चुकी हैं। वह दस मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग में देश की दूसरे रैंक की पैराशूटर है। आकांक्षा का कहना है कि कुछ भी नामुमकिन नहीं है। केवल खुद पर विश्वास होना चाहिए।
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ग्राम जलालपुर सुल्तान निवासी बेगराज सिंह अपनी गृहस्थी में रमे थे । वह मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे । सन 2006 में घटी एक घटना ने उनका पूरा जीवन परिवर्तित कर दिया । बेगराज सिंह उस दौरान गहाई मशीन पर काम कर रहे थे ।अचानक एक दिन उनका दायां हाथ मशीन में पिस जाने के कारण उनका हाथ कंधे के पास से काटना पड़ा। उनके जीवन में सब कुछ खत्म हो चुका था। जिस हाथ से वह काम करते थे तथा जिससे खाना खाते थे वह हाथ कट चुका था । पीछे बड़ी गृहस्थी पत्नी के अलावा दो बेटे और दो बेटियां । घर में वह अकेले कमाने वाले थे और बच्चे छोटे थे । उन्होंने हौसला नहीं हारा। उन्होंने बाएं हाथ से काम करना शुरू किया और बाएं हाथ को दाएं के समान अभ्यस्थ कर दिया। इसके बाद उन्होंने राजगीर का काम शुरू किया। वे आज भी राजगीर का काम कर रहे हैं। वह अब क्षेत्र के जाने-माने राजमिस्त्री हैं और इसी काम से अपनी दो बेटियों की शादी अच्छे घरों में कर चुके हैं। बेगराज सिंह बताते हैं कि जब उनका हाथ कट गया तब एक बार को लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया है। उनके पास ना तो कोई जमीन जायदाद थी ना इतनी धनराशि कि जिससे वे सही से इलाज करा पाते। लेकिन उन्होंने ईश्वर पर विश्वास रखा और अपने लिए मेहनत की राह चुनी ।बेगराज सिंह बताते हैं कि उन्हें आज भी काम मांगने जाने की जरूरत नहीं पड़ती ।
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