- स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में अंकित है छेदा सिंह का नाम
संवाद न्यूज एजेंसी
अफजलगढ़। देश की आजादी के लिए चलाए गए आंदोलन में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने भाग लिया था। अफजलगढ़ क्षेत्र के कासमपुर गढ़ी में एक साधारण परिवार में 1901 में जन्मे अमर सेनानी छेदा सिंह चौहान ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
पिता प्रसादी सिंह उन्हें पढ़ा-लिखाकर अफसर बनना चाहते थे, लेकिन बचपन से ही छेदा सिंह में देशभक्ति की भावना भरी थी। मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के दौरान अंग्रेज शासन के अत्याचार ने उनके बाल मन को झकझोर दिया था। उन्होंने भारत मां को आजाद कराने के लिए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन में कूद गए। गांव-गांव जाकर लोगों को अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध खड़ा किया। 1930 में अपने क्षेत्र में अग्रणी रहे।
नारों और भाषणों के माध्यम से आंदोलन में जन चेतना का प्रसार किया, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें 19 जनवरी सन् 1932 को गिरफ्तार किया और उन्हें एक वर्ष की कैद हुई। अंग्रेजों ने उनका मनोबल कम करने के लिए जेल में यातनाएं दी थीं। 8 जून 1933 को जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में और बड़ी भूमिका निभाई। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन में उनकी खासी भूमिका रही।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता का वह दिवस आ ही गया, जिसके लिए उन जैसे हजारों बलिदानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था। आजादी के लिए उनके संघर्ष को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने हाथों से उनको सम्मान स्वरूप ताम्रपत्र भेंट किया था, जो क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि थी। विकास खंड कार्यालय कासमपुर गढ़ी परिसर में शिलापट पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में छेदा सिंह का नाम अंकित किया गया है।
जनसेवा के चलते हुए उन्हें गांव का सरपंच बनाया गया। साथ ही कासमपुर गढ़ी एचसीएम इंटर कॉलेज की तत्कालीन प्रबंधक कुंवरानी चंद्रकांता ने अपने पद से इस्तीफा देकर छेदा सिंह चौहान को प्रबंधक बनाया। उन्होंने गांव की बेटियों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए अनेक प्रयास किए।
अफजलगढ़ के स्वतंत्रता सेनानी छेदा सिंह का फाइल फोटो।