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UP: गन्ने के खेतों में शरणार्थी बनकर आए, अब राजा बन गए गुलदार, बिजनाैर में संख्या पहुंची 500 से भी ज्यादा

Wed, 11 Sep 2024 03:27 PM IST
मेरठ ब्यूरो रजनीश त्यागी, अमर उजाला, बिजनाैर

सार

चार वर्ष पहले काेरोनाकाल में गुलदार के परिवारों ने रिजर्व फॉरेस्ट से निकलकर गन्ने के खेतों में शरण ली थी। अब इनका कुनबा इतना बढ़ गया है कि क्षेत्र में कुत्तों की तरह विचरण करते दिखाई दे जाते हैं। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार मादा गुलदार एक बार में चार शावकों को जन्म देती है। 
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बिजनौर के जंगल में घूमता गुलदार। फाइल फोटो
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विस्तार
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बिजनौर जिले में गुलदार आपदा बन गया है। इनकी संख्या का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले डेढ़ साल में 67 गुलदार वन विभाग पकड़ चुका है। वहीं, 35 गुलदार दुर्घटना, आपसी संघर्ष में मारे जा चुके हैं। वन्य जीव विशेषज्ञों का मानना है कि काेरोनाकाल में रिजर्व फॉरेस्ट से गन्ने के खेतों में आए गुलदार अब यहां के राजा बन बैठे हैं। चार साल पहले जन्मे गुलदार के शावक अब बड़े शिकारी बन चुके हैं। जिले में 2.68 लाख हेक्टेयर गन्ने का रकबा है। गन्ने के खेतों में इनकी संख्या 500 से भी ज्यादा होने का अनुमान है।
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गुलदार को लैपर्ड और तेंदुआ भी कहते हैं...
आमतौर पर गुलदार के नाम को लेकर लोगों के बीच संशय की स्थिति रहती है। यह जीव बिजनौर जिले में गुलदार के नाम ज्यादा जाना जाता है। इसके अलावा इसे तेंदुआ और लैपर्ड भी कहा जाता है। कुछ लोग इसे अलग-अलग मानते हैं, लेकिन वन्य जीव विशेषज्ञों का कहना है कि इसके शरीर पर उभरी आकृति फूल जैसी होती है, जिसे उर्दू में गुल कहते हैं। इसलिए ही इसे गुलदार नाम मिला। हिन्दी में इसे तेंदुआ और अंग्रेजी में लैपर्ड कहते हैं।

व्यवहार में आया बदलाव, जोड़े में भी दिख रहा
रिजर्व फॉरेस्ट और गन्ने के खेतों में मिलने वाले गुलदार के व्यवहार में काफी अंतर देखा जा रहा है। रिजर्व फॉरेस्ट में गुलदार को जोड़े में न के बराकर देखा जाता है। केवल प्रजनन के लिए ही यह साथ आते थे। उधर, आबादी क्षेत्रों के आसपास घूम रहे गुलदार जोड़े में देखे जा रहे हैं। दो दिन पहले ही भनेड़ा के पास एक कुएं भी छत पर दो गुलदार एक साथ बैठे नजर आए थे।

प्रजनन दर बढ़ी, शावकों को नहीं रहा खतरा
रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्रों में गुलदार के प्रजनन का समय अगस्त से अक्तूबर के बीच ही माना जाता था। यह साल में एक या दो बार शावकों को जन्म देती। उधर, गन्ने के खेतों में जनवरी से लेकर दिसंबर तक शावक मिले हैं। ऐसे में यहां पर यह जोड़ा बनाकर रहने लगा और साल में दो से तीन बार शावकों को जन्म दे रहे हैं। उधर, रिजर्व फॉरेस्ट में इनके शावकों को बाघ, भालू और अन्य हिंसक जानवरों से खतरा रहता था। चार में से एक या दो ही जीवित रहते थे। गन्ने के खेतों में गुलदार से भिड़ने वाला कोई जानवर नहीं है। इसलिए सभी जीवित है।
 
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गुलदारों का बढ़ता वजन इंसानों के लिए खतरा
जिले में अब तक मिले सभी गुलदार सेहतमंद मिले हैं। आमतौर पर 60 से 65 किलो वजन का रहने वाला गुलदार अब 90 किलोग्राम तक का हो रहा है। ऐसे अधिक वजन वाले गुलदार जानवरों के पीछे दौड़ने में अक्षम होते जा रहे हैं तो इंसानों पर हमले करने लग जाते हैं। नगीना और अफजलगढ़ और चांदपुर क्षेत्र में पकड़े गए तीनों नरभक्षी गुलदार 80 किलोग्राम से ज्यादा के थे।

इन परिस्थितियों में खतरनाक हो रहे गुलदार
-घायल होने पर गुलदार इंसानों पर हमले करने लगता है
-बढ़ती उम्र के साथ भी गुलदार नरभक्षी बनने लगता है
-कैनाइन मुंह के बड़े दांत टूटने पर भी गुलदार इंसानों पर हमला करता है
-एक बार इंसानी मांस चखने के बाद भी गुलदार नरभक्षी बन जाता है

गन्ने के खेतों से नहीं जाएगा गुलदार : जोएल लायल
जिम कार्बेट रिसर्च स्कॉलर जोएल लायल कहते हैं कि गुलदार जंगल का सबसे धूर्त जानवर है। यह छिपकर हमला करने में माहिर होता है। बिजनौर में अब यह गन्ने के खेतों से नहीं जाने वाला है। यहां जिन शावकों ने जन्म लिया है, उनके लिए यही घर है। यहीं पर यह अपना क्षेत्र बना रहा है, इसलिए ही लगातार गुलदारों का दायरा बढ़ रहा है।

हम प्रयास कर रहे हैं
जिले में 87 गांव संवेदनशील है। हम लगातार गुलदार पकड़ रहे हैं। लोगों को जागरुक भी कर रहे हैं। 160 पिंजरे जिलेभर में लगाए गए हैं। इसके अलावा विशेषज्ञों से ठोस रणनीति तैयार कराई जा रही है। - ज्ञान सिंह, बिजनौर डीएफओ
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