स्वतंत्रता संग्राम में बिजनौर जिले के ऐसे कई रणवांकुरे हुए हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। आज हम बात करें रहे हैं ऐसे ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खूब सिंह की जिनकी हिम्मत के आगे अंग्रेजों को नाकों चने चबाने पडे़ थे। इंग्लैंड तक उनके नाम की गूंज पहुंच गई थी। उनके घर से झंडा उतारने को अंग्रेज बड़ी संख्या बल में गांव जयनगर में पहुंचे थे। इस मामले की खबर मैनचेस्टर गार्जियन अखबार में छपी थी। जिसका शीर्षक जयनगर पर पुन: अधिकार दिया गया था।
जनपद के अफजलगढ़ विकासखंड के गांव जयनगर में 15 मई 1907 को जन्मे खूब सिंह ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था। उनके पौत्र ललित कुमार बताते हैं कि वह कांग्रेस के गरम दल के नेता माने जाते थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया। छोटी उम्र में ही पिता अतर सिंह की मृत्यु के बाद खूब सिंह मुरादाबाद चले गए। 1932 में वह मुरादाबाद से लौटे और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद गए।
वे 1930, 1932, 1941 और 1942 में जेल गए। 1937 में वह कांग्रेस की ओर से असेंबली के लिए चुने गए। इस चुनाव में उन्होंने संयुक्त मोर्चा की प्रत्याशी को हराया था। वह 1952, 1957 और 1962 में धामपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। उन्होंने मुरादाबाद जनपद के सुरजननगर में अपनी भूमि दान देकर गांधी स्मारक महाविद्यालय की स्थापना कराई।
क्षेत्रीय इतिहास संकलन अभियान जनपद बिजनौर के संचालक गांव फीना निवासी हेमंत कुमार बताते हैं कि खूब सिंह ने एक बार अपने गांव में कांग्रेस का सम्मेलन कराया था, जिसमें लगभग बीस हजार लोग जुटे थे। इस सम्मेलन ने अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी और खूब सिंह उनकी आंख की किरकिरी बन गए थे।
घर पर लगा दिया था तिरंगा
हेमंत कुमार बताते हैं कि 1941-42 के आसपास खूब सिंह ने अपने घर पर तिरंगा लगा दिया जो उस समय पर अपराध की श्रेणी में आता था। इसे उतारने के लिए अंग्रेजी सिपाही कई बार जयनगर आए, लेकिन हर बार उन्हें खदेड़ दिया जाता था। इसके बाद अंग्रेजी सेना ने जयनगर गांव को घेर लिया और संख्या बल के आधार पर कार्रवाई करते हुए तिरंगा झंडा उतार दिया था। यह उस समय अंग्रेजी शासन के लिए इतनी बड़ी घटना थी कि यह इंग्लैंड के मैनचेस्टर से प्रकाशित होने वाले गार्जियन अखबार में ‘जयनगर पर पुन: अधिकार’ आशय वाले शीर्षक के साथ प्रकाशित की गई।
1941 में उन्हें अंग्रेजी हुकूमत द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। न्यायालय ने उन्हें एक वर्ष सश्रम कारावास और 50 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जेल से लौटने के बाद उन्होंने टोली बनाकर सरकारी कांजी हाउस से पशु मुक्त कराएं और उसमें आग लगा दी थी। इसके बाद वह भूमिगत हो गए थे। 1942 में उन्हें पुन: गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।