ग्राम कढ़ापुर में आस्ट्रेलियाई गन्ने को दिखाता किसान।
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बिजनौर में ऑस्ट्रेलिया का गन्ना बिजनौर में फेल हो गया है। जिले में इस गन्ने की रिकवरी बहुत कम आई है। यहां तक कि हमारे यहां के रिजेक्ट प्रजाति के गन्ने में भी ऑस्ट्रेलियाई प्रजाति के गन्ने से अधिक रिकवरी है। जिले में कुछ किसानों ने यह गन्ना बो रखा है। शुगर मिलों ने किसानों को यह गन्ना न बोने की सलाह दी है।
हल्दौर क्षेत्र के गांव कड़ापुर निवासी किसान बिजेंद्र सिंह के पास कहीं से ऑस्ट्रेलिया के गन्ने का बीज आया था। किसान ने खेत में गन्ने की नर्सरी तैयार की और इसे दो बीघा जमीन में लगा दिया। धीरे धीरे क्षेत्र के कुछ हिस्से में यह गन्ना बढ़ता गया। पैदावार में यह गन्ना 100 क्विंटल प्रति बीघा तक पहुंच गया। बिलाई शुगर मिल तक भी इस गन्ने की चर्चा पहुंची। मिल प्रशासन ने किसानों के खेतों से गन्ना लेकर इसकी रिकवरी/चीनी परते की जांच कराई। जांच में ऑस्ट्रेलियाई गन्ने की रिकवरी केवल आठ प्रतिशत आई। इतनी कम रिकवरी वाले गन्ने को बोना आज के समय में घाटे का सौदा है। मिलों ने इस गन्ने को न बोने के लिए किसानों को जागरूक करना शुरू किया है। किसानों से इस प्रजाति को खत्म करने के लिए कहा जा रहा है।
जिले के गन्ने की रिकवरी 13 प्रतिशत तक है। जिले में गन्ने के कुल रकबे में करीब 95 प्रतिशत हिस्से में अर्ली प्रजाति का गन्ना खड़ा है। किसानों ने सामान्य व रिजेक्ट प्रजाति का गन्ना बोना बंद कर दिया है। अर्ली प्रजाति के गन्ने का दस रुपये प्रति क्विंटल अधिक रेट भी मिलता है। जब जिले में रिजेक्ट प्रजाति का गन्ना अधिक होता था, तब जिले में रिकवरी नौ प्रतिशत तक थी। बिलाई शुगर मिल के जीएम केन परोपकार सिंह के मुतातिबक किसान ऑस्ट्रेलिया का या रिजेक्ट प्रजाति का गन्ना न बोएं। इसमें किसानों व शुगर मिलों दोनों को ही नुकसान है।