कृषि विभाग ने फसलों में यूरिया की मात्रा की निर्धारित
बिजनौर। यूरिया व बाकी पेस्टीसाइड का फसलों में अंधाधुंध इस्तेमाल जमीन को बंजरता की ओर ले जा सकता है। किसान कई बार कम लागत वाली खेतों में यूरिया, डीएपी आदि ज्यादा मात्रा में डाल देते हैं। कृषि विभाग ने फसलों में डालने के लिए यूरिया के मानक तय किए हैं। किसानों को फसलों में उसी की मात्रा के अनुसार यूरिया डालने के लिए जागरूक करेगा।
कभी यूरिया के बिना जैविक खेती होती थी और अब किसान खेतों में इतना यूरिया डाल रहे हैं कि प्रदेश भर में यूरिया की किल्लत हो गई है। खेतों में यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है। अब सरकार फिर से किसानों को जैविक खेती की ओर मोड़ना चाहती है। जैविक खेती में किसान बिना यूरिया, डीएपी, एमओपी, पेस्टीसाइड व अन्य रसायनों के खेती करते हैं। इससे फसल एकदम शुद्ध एवं प्राकृतिक तो होती ही है इसे खाने से कोई नुकसान नहीं होता है। गंगा किनारे के गांवों में जैविक खेती शुरू करा भी दी गई है। सभी किसानों को एकदम से यूरिया का इस्तेमाल खत्म करने के लिए तो तैयार नहीं किया जा सकता है लेकिन किसान को एक निश्चित सीमा तक ही यूरिया के इस्तेमाल को प्रेरित किया जा सकत है। हर फसल में यूरिया की खपत अलग-अलग होती है। फसलों में खपत के अनुसार यूरिया डालने के लिए किसानों को अब कृषि विभाग जागरूक करेगा।
फसल यूरिया डीएपी एमओपी
धान 236 130 100
मक्का 211 130 100
उर्दू/मूंग 00 87 00
अरहर 00 87 00
मूंगफली 65 281 00
तिल 45 125 00
गन्ना 325 175 100
नोट: आंकड़े किलोग्राम में हैं। प्रति हेक्टेयर के हिसाब से ये मात्रा निर्धारित की गई है।
जमीन की प्रवृत्ति हो जाती है खुश्क
यूरिया में मौजूद नाइट्रोजन फसलों की कोशिकाओं को बढ़ाता है। इसमें पानी की पूर्ति को पौधा जमीन से पूरा करता है। यूरिया का लगातार प्रयोग करने पर जमीन का स्वभाव खुश्क हो जाता है। यानि जमीन को पानी की जरूरत सामान्य से कहीं ज्यादा पड़ती है। यह जमीन के बंजर होने का ही एक लक्षण है।
हर वस्तु के इस्तेमाल की सीमा
जिला कृषि अधिकारी डा.अवधेश मिश्र के अनुसार पदार्थ के इस्तेेमाल की एक सीमा होती है। किसान खेत में ज्यादा यूरिया डालकर अपनी खेती की लागत बढ़ा रहे हैं साथ ही जमीन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसान कृषि विभाग की सूची के अनुसार ही यूरिया का प्रयोग फसलों में करें।