नजीबाबाद। 15 अगस्त 1947 को नजीबाबाद में आजादी का जश्न नवाब नजीबुद्दौला के किले पर आयोजित किया गया था। ध्वजारोहण में बड़ी तादात में लोगाें ने प्रतिभाग किया था, लेकिन उसके बाद से हर स्वतंत्रता दिवस पर यह किला मौन रहकर लोगों की ओर निहारता रहता है। अब हर साल कार्यक्रम का आयोजन तो होता है, लेकिन किले के बजाय रत्ना चौक पर।
नवाब नजीबुद्दौला ने 1755 में गांव महावतपुर में किले का निर्माण कराया था। लोगों का कहना है कि पत्थरगढ़ के किले के नाम से मशहूर इस किले में सुल्ताना डाकू ने पनाह ली थी। इस कारण इस किले को नवाब नजीबुद्दौला का किला कम और सुल्ताना डाकू के किले के नाम से अधिक लोग जानते हैं। निर्माण के समय से ही क्षेत्र में इस किले का ऐतिहासिक महत्व रहा है। देश की आजादी के पहले समारोह का क्षेत्र में यहीं किला गवाह बना था। अगस्त 1947 में ब्रितानियों से आजादी मिलने की खबर सुनकर क्षेत्रीय लोगों की खुशी सातवें आसमान पर थी। आजादी के मतवालों को समाचार मिला था कि 15 अगस्त 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरू देश को आजादी मिलने पर दिल्ली स्थित लाल किले पर ध्वजारोहण करेंगे। यह समाचार मिलने पर क्षेत्रीय लोगों ने भी नवाब नजीबुद्दौला के किले पर ध्वजारोहण करने का निर्णय लिया।
15 अगस्त 1947 को तत्कालीन कांग्रेस के जिलाध्यक्ष चंद्रशेखर गोविल के नेतृत्व में दस हजार से अधिक लोगों की भीड़ नवाब नजीबुद्दौला के किले पर एकत्र हुई थी। 14 वर्षीय बालिका करुणा माहेश्वरी ने आजादी की खुली फिजा में पहली बार नजीबुद्दौला के किले पर ध्वजारोहण किया। उपस्थित जनसमुदाय ने करतल ध्वनि और फूलों की वर्षा कर आजादी मिलने पर खुशी का इजहार किया था। समारोह में स्वत्रंता सेनानी मुलेशचंद जैन, जेपी जाखेटिया, शिवचरण दास जाखेटिया, जगत भूषण मुष्टिक, नेमीशरण मित्तल, जगदीश वैश्य, ओमप्रकाश, सुंदरलाल आदि लोग शामिल हुए थे।
लेकिन आजादी मिलने के बाद पहले ध्वजारोहण का गवाह यह किला अब हर स्वतंत्रता दिवस पर मौन होकर लोगों की ओर देखता रहता है। 15 अगस्त 1947 के बाद से इस किले पर कभी आजादी का जश्न नहीं मनाया गया। वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी जगदीश प्रसाद जाखेटिया बताते हैं कि 1947 के बाद से हमेशा चौक बाजार की रत्ना मार्केट में ध्वजारोहण कार्यक्रम होता आया है।