उलमा ने किया एलान, पहला रोजा आज
- बुराइयों से बचने और इंसानियत के रास्ते पर चलने का महीना है माह ए रमजान
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अमर उजाला ब्यूरो
बिजनौर। आज से माह-ए-रमजान शुरु हो चुका है। पहला रोजा मंगलवार को रखा जाएगा। मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इसकी पुष्टि की है। रमजान का महीना इबादत और रहमतों का खजाना है, रमजान बरकतों का महीना है। इस महीने अल्लाह ताला अपने बंदों के गुनाहों को माफ कर दोजख से आजादी का परवाना अता करता है। कारी अरशद महमूद ने बताया कि रमजान सब्र का महीना है, सब्र का इनाम जन्नत है। रोजा रमजान की अहम इबादत है। रोजा इंसान को बुरे कामों से रोककर अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करता है। रमजान में ईशा की नमाज के बाद 20 रकअत तरावीह (विशेष नमाज) पढ़ी जाती है।
चाहशीरी जामा मस्जिद के मौलाना वरीस अहमद बताते हैं कि रमजान का चांद देखने के बाद सभी मस्जिदों में तरावीह की नमाज अदा की जाती है। रोजा व्यवहार, इंसाफ इंसानियत और हमदर्दी की ओर ले जाता है। अल्लाह ने रमजान का रोजा फर्ज किया है, ताकि उसके वंदे नेक बन जाएं। इस महीने में की जाने वाली इबादत का सवाब बढ़ा दिया जाता है। उन्होंने कहा कि रमजान के महीने में रोजा छोड़ना गुनाह है। जो शख्स बिना किसी कारण जान बूझकर रोजा छोड़ता है तो ताउम्र भी रोजा रखने से उस शख्स को इस एक रोजे के बराबर फजीलत हासिल नहीं हो सकती।
कारी अब्दुल वाहिद बताते हैं कि रमजान के महीनों में दो सुन्नतें अलग-अलग हैं। एक तो रमजान का चांद नजर आने से लेकर आखिरी रमजान तक तरावीह का पढ़ना, दूसरा पूरे पुराने करीम को तरावीह में सुनना। कुछ लोग ऐसा करते हैं कि पांच या दस दिन तरावीह पढ़ लेते हैं और इसके बाद तरावीह पढ़ना छोड़ देते हैं, यह सरासर गलत है। उन्हें तरावीह छोड़ने का गुनाह मिलता है। कारी इकराम का कहना है कि मुसलमानों को चाहिए कि रमजान के महीने में रोजे को पूरे नियम के साथ रखना चाहिए। रोजा सुबह से शाम तक सिर्फ भूखे और प्यासे रहना का ही नाम नहीं है। बल्कि रोजा रखने के बाद किसी को सताना, धोखा देना, बेइज्जत करना, किसी गलत चीज को देखना आदि इन सब चीजों से बचना जरूरी है। जो शख्स रोजा रखकर ये सब काम करता है, हदीस के एतबार से उसको भूखा और प्यासा रहने के अलावा कुछ भी (सवाब) हासिल नहीं होता।