बिजनौर। पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न की वजह से भगाए गए सैकड़ों शरणार्थी परिवारों को नागरिकता तो मिल गई, लेकिन 79 साल बाद अब इनके घर और जिस भूमि पर खेती कर रहे हैं, उस पर मालिकाना हक अब मिलने जा रहा है। धामपुर और नगीना तहसील के 18 गांवों में रह रहे 3856 परिवारों को इनकी जमीनों पर मालिकाना हक देने के प्रस्ताव पर कैबिनेट ने मुहर लगा दी है। इससे अब ये किसान न केवल खेती कर पाएंगे, बल्कि अपनी गन्ने और गेहूं की फसल को सरकारी रेट पर शुगरमिल और गेहूं क्रय केंद्रों पर बेच पाएंगे।
यह सभी परिवार अफजलगढ़ क्षेत्र में रहते हैं। जब पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए तो सरकार ने इन्हें इसी क्षेत्र में खेती के लिए जमीन थी। उस समय यह जमीनें बंजर थी, लेकिन इन्होंने बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया। इसके बाद इन्हें भारतीय नागरिकता भी मिल गई और मतदाता भी बन गए। 79 साल से ये किसान अपनी जमीन पर मालिकाना हक पाने की लड़ाई लड़ रहे थे।
वर्ष 2020 में क्षेत्रीय बढ़ापुर विधायक सुशांत सिंह ने इन्हें मालिकाना हक दिलाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के सामने रखा, तब से इन जमीनों का सर्वे चल रहा है। पिछले साल शासन की टीम भी क्षेत्र में आई थी और इन किसानों का पूरा रिकॉर्ड तैयार कर प्रस्ताव शासन को भेजा गया। अब कैबिनेट ने इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी, जो इस क्षेत्र के विस्थापित किसानों के लिए बढ़ी राहत देगी।
बंद हो गया था गन्ना सट्टा, हुआ था आंदोलन : शरणार्थी परिवारों के लोग गन्ने की खेती भी कर रहे हैं। इन किसानों को चीनी मिलें जमीन नाम न होने के बाद भी गन्ना पर्ची जारी करतीं थी। जमीन की खतौनी न देने के कारण वर्ष 2018 में इनके सट्टे बंद कर दिए गए थे। तभी से ये किसान फसल बेचने को लेकर परेशान थे। किसान संगठनों ने सट्टे शुरू कराने के लिए आंदोलन भी किए थे।