गंगा बैराज के पास बनेगी कछुओं की हैचरी
बिजनौर। गंगा के आसपास के क्षेत्र में मिट्टी से निकलने वाले कछुओं के अंडों को वन विभाग सहेजेगा। इसके लिए गंगा किनारे गंगा बैराज के पास हैचरी बनाई जाएगी। गंगा किनारे के खेतों से कछुए के अंडे एकत्र करके इस हैचरी में रखे जाएंगे। अंडों से कछुए निकलने के बाद इन्हें गंगा में छोड़ा जाएगा।
गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए नमामि गंगे और हरितिमा गंगा जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं में गंगा किनारे सफाई अभियान चलाने से लेकर औषधीय पौधे तक लगाए जा रहे हैं। गंगा में पाए जाने वाले जीव भी गंगा की सफाई में अहम भूमिका निभाते हैं। कछुओं को भी गंगा का प्राकृतिक सफाई कर्मचारी कहा जाता है। गंगा नदी की धारा में कछुओं की 12 प्रजाति पाई जाती हैं। इनमें से छह प्रजाति खतरे में हैं। कछुए गंगा नदी के तट पर रेत में घोंसला बनाकर अंडे देते हैं।
गंगा नदी के बहाव का क्षेत्र हर साल बदल जाता है। जहां गंगा का पानी नहीं होता, वहां पर किसान खेती करने लगते हैं। इस जमीन की जुताई करने, खेतों में फसल को पानी देने व पेस्टीसाइट का प्रयोग करने से अंडे नष्ट होते हैं। किसान भी अंडों को फेंक देते हैं। ऐसे ही हर साल हजारों अंडे बर्बाद हो जाते हैं और कछुओं संख्या अपेक्षाकृत नहीं बढ़ती है। कछुओं के अंडों को सहेजकर उनकी संख्या बढ़ाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्ड फंड) ने अभियान चला रखा है।
अब वन विभाग भी अभियान के अंतर्गत गंगा किनारे हैचरी (प्रजनन केंद्र) बनाई गई थी। गंगा बैराज से आगे कछुओं के अंडों को रखने के लिए हैचरी बनाई जाएगी। जहां भी किसान के खेत में अंडे निकलेंगे, वन विभाग के कर्मचारी उन्हें किसानों से लेंगे। इन अंडों को हैचरी में मानव निर्मित घोंसलों में रखा जाएगा। घोंसलों को सुरक्षित स्थान पर बनाया जाएगा। अंडों से कछुओं के बाहर आने के बाद इन्हें गंगा की धारा में छोड़ दिया जाएगा।
तापमान और नमी का रखते हैं ध्यान
कछुए नवंबर से अप्रैल तक अंडे देते हैं। घोंसला बनाकर अंडा देते समय वे तापमान और नमी का ध्यान रखते हैं। कछुए घोंसले में अंडे की परत बनाते हैं। सबसे ऊपर की परत से बच्चे सबसे पहले निकलते हैं। इंसानी घोंसलों में अंडों से कछुऐ के बच्चा पैदा होने से डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी भी गदगद हैं। कछुआ अंडे देने के बाद घोंसले के पास फिर नहीं आता है। फिर भी उसके बच्चे अंडे से निकलकर सीधे नदी की ओर ही भागते हैं। वाइल्ड लाइफ के अधिकारी अभी भी इस पर शोध कर रहे हैं कि ऐसा कैसे होता है। डीएफओ डॉ. एम सेम्मारन के मुताबिक गंगा किनारे हैचरी बनाई जाएगी। जिले में भी कछुओं की प्रजाति को बचाने के लिए पूरे प्रयास किए जाएंगे।