नौलखा के प्रवेश द्वार में आईं दरार
बिजनौर। पुरातत्व संबंधी जनपद की धरोहर ध्वस्त हो रही हैं। संबधित विभाग को कुछ लेना देना नहीं। पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर का बोर्ड लगाकर अपने कार्य की इतिश्री कर दी जाती है। देखरेख के अभाव में ये नष्ट होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। ऐसा ही हाल जहानाबाद के नौलखा के साथ हो रहा है। इसकी बांउड्री गिरती जा रही है। भव्य प्रवेश द्वार में दरार आ गई हैं। वहीं शुजात खान के मकबरे पर रंग कराकर उसका सौंदर्य बिगाड़ दिया गया है। जहानाबाद में नौलखा बाग है। एतिहासिक उल्लेख के अनुसार बंगाल विजय के बाद यहां आए शाहजहां ने यह पूरा क्षेत्र बंगाल विजय के हीरो शुजात खान को ईनाम में दे दिया। पहले इसका नाम गोवर्धनपुर था। शुजात खान ने बादशाह का सम्मान रखते हुए इस क्षेत्र का नाम पर जहानाबाद रखा। इसी क्षेत्र में यह नौ लखा बाग स्थित है। लगभग दस एकड़ क्षेत्र में चारों ओर मजबूत दीवार और बीस फुट ऊंचे भव्य प्रवेश द्वार लिए इस बाग को शुजात खान के मकबरे के नाम से भी जाना जाता है। नौ लखा नाम क्यों पड़ा इस बारे में कोई नहीं बताता। पुराने लोग कहते थे बाग में बेइंतहा पेड़ होने के कारण शायद नाम नौलखा पड़ गया होगा। शुजात खान के अलावा उनकी पत्नी और दासी के भी यहां मकबरे हैं। एक ओर कई मजार हैं। कहा जाता है कि ये शुजात खान के हाथी और घोड़ों के मजार हैं। यहां एक मस्जिद भी है।
डिस्ट्रिक्ट गजेटियर के अनुसार औरंगजेब के समय के रईस नवाब सैयद मुहम्मद शुजात खान का मजार है। 1847 की आजादी की लड़ाई में भाग लेने के कारण नवाब शुजात के वंशजों की संपत्ति अंग्रेजों ने जब्त कर हल्दौर के एक परिवार को उनकी निष्ठा के लिए दे दी गई। शुजात खान का मकबरा 1647 में बना। ये मकबरा दस फीट ऊंचे चबूतरे पर भूरे रंग के पत्थर से बना। इसका फर्श भी इसी पत्थर का बना है। इसका गेट और गुम्बद आगरा के लाल पत्थर से बना है। गुम्बद के बाहर और अंदर निचले भाग में कुरान शरीफ की आयतें खुदी हैं। इनकी पत्नी का मकबरा छोटा है, लेकिन भव्य है।
अपना बोर्ड लगाकर ही भूल गया पुरातत्व विभाग
यहां पुरातत्व विभाग के जगह जगह बोर्ड लगे हैं। उन पर लिखा है कि ये पुरातत्व विभाग की संपत्ति है। इसके एक सौ मीटर क्षेत्र में निर्माण करना निषिद्घ है। विभाग ये बोर्ड लगाकर भूल गया। नौलखा की बाउंड्री से सटाकर खेती की जा रही है। मजार की व्यवस्था करने वालों ने हरा रंग कराकर शुजात खान के मकबरे का वास्तविक स्वरूप ही बिगाड़ दिया है।
नौलखा इतिहास की बेशकीमती धरोहर
नौलखा का द्वार क्षतिग्रस्त हो रहा है। इसके ऊपरी भाग में दरार आ गई। गेट के अंदर बने कमरों में चिमगादड़ के मल की इतनी बदबू आती है कि अब तो यहां खड़ा होना भी संभव नहीं है। पहले ये हालत गेट के अंदर स्टाफ के रहने के लिए बनी कोठरियों की थी। बिजनौर के इतिहास के जानकार शकील बिजनौरी का कहना है कि नौलखा इतिहास की बेशकीमती धरोहर है, इसका संरक्षण बहुत जरूरी है।