बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल
बिजनौर। देशभर में गोगा जाहरवीर उर्फ जाहरपीर के करोड़ों अनुयायी हैं। सावन में हरियाली तीज से भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी तक गोगा जाहरवीर उर्फ जाहरपीर की म्हाढी पर श्रद्धालु आकर निशान चढ़ाकर पूजन-अर्चन करते हैं। गोगा हिंदुओं में जाहरवीर है तो मुस्लिमों में जाहरपीर । दोनों संप्रदाय में इनकी बड़ी मान्यता है।
यह बात कम ही लोग जानते हैं कि राजस्थान में जन्मे गोगा उर्फ जाहरवीर की ननसाल बिजनौर जिले के रेहड़ गांव में है। इनकी मां बाछल जिले में जहां-जहां गईं, वहां-वहां आज मेले लगते हैं। जाहरवीर के नाना का नाम राजा कोरापाल सिंह था। गर्भावस्था में काफी समय बाछल पिता के घर रेहड़ में रहीं। रेहड़ के राजा कुंवरपाल की बेटी बाछल और कांछल का विवाह राजस्थान के चुरु जिले के ददरेजा गांव में राजा जेवर सिंह व उनके भाई राजकुमार नेबर सिंह से हुआ।
जाहरवीर के इतिहास के जानकारों के अनुसार, बाछल ने पुत्र प्राप्ति के लिए गुरु गोरखनाथ की लंबे समय तक पूजा की। गोरखनाथ ने उन्हेें झोली से गूगल नामक औषधि दी और कहा कि जिन्हें संतान न होती हो, उन्हें यह खिला देना। रानी बाछल से थोड़ा-थोड़ा गूगल पंडिताइन, बांदी और घोड़ी को देकर बचा काफी भाग खुद खा लिया। औषधि के नाम पर उनकी संतान का नाम गोगा हो गया। वैसे रानी ने बेटे का नाम जाहरवीर रखा। पंडिताइन के बेटे का नाम नरसिंह पांडे और बांदी के बेटे का नाम भज्जू कोतवाल पड़ा। घोड़ी के नीले रंग का बछेड़ा हुआ। गोगा की मौसी के भी गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से दो बच्चे हुए।
ये सब साथ साथ खेलकर बड़े हुए। बाछल ने जाहरवीर को वंश परपंरा के अनुसार शस्त्र कला सिखाई और विद्वान बनाया। जाहरवीर नीले घोड़े पर चढ़कर निकलते और मिल-जुलकर रहते। गुरु गोरखनाथ के ददरेजा आने पर जाहरवीर ने उनकी सेवा की और फिर उनकी जमात में निकल गए। गुरु के साथ वह काबुल, गजनी, इरान, अफगानिस्तान आदि देशों में घूमे। उनके उपदेश हिंदू-मुस्लिम एकता पर आधारित होते थे। भाषा के कारण वे मुस्लिमों में जाहरपीर हो गए। जाहरपीर का नीला घोड़ा और हाथ का निशान उनकी पहचान बन गए।
मां बाछल ने किसी बात पर इन्हें घर न आने की शपथ दी थी, किंतु ये पत्नी से मिलने छिपकर महल आते। श्रावण मास की हरियाली तीज पर मां ने देख लिया और पीछा किया तो ये हनुमानगढ़ के निर्जन स्थान में घोड़े समेत जमीन में समा गए। उस दिन भाद्रपद के कृष्णपक्ष की नवमी थी। तभी से देश के कोने-कोने से आज तक प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु राजस्थान के ददरेवा में स्थित जाहरवीर के महल एवं गोगामेढ़ी नामक स्थान पर उनकी म्हाढ़ी पर प्रसाद चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं। देशभर में जहां जहां जाहरवीर गए। वहां उनकी म्हाढ़ी बन गई।
मान्यता है कि गर्भावस्था में रेहड़ में मां बाछल के रहने के स्थान पर ही जाहरवीर गोगा जी की म्हाढ़ी है। महल नष्ट हो गया है। यहां प्रत्येक वर्ष भाद्रपद की नवमी को हजारों श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाकर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं। बिजनौर के पास गंज, फीना और गुहावर में भी इस अवधि में मेले लगते हैं। किंवदंति है कि जिस दंपति को संतान सुख नहीं मिलता, जाहरवीर गोगा जी की म्हाढ़ी पर सच्चे मन से प्रार्थना पर मुराद पूरी होती है। यह भी कहा जाता है कि गोगा पीर ने गर्भ में रहने के दौरान मां बाछल से कहा कि वह गंज में जाकर जात दें। बाछल ने जात दी। ये भी मान्यता है कि म्हाढ़ी पर आकर प्रसाद चढ़ाने से सांप नहीं काटता और घर में सांप का वास नहीं होता। एक मुगल राजा की महारानी को सांप के काटने के बाद यहां की म्हाढ़ी पर लाया गया था।
गंगा स्नान के बाद चढ़ाते हैं प्रसाद
गंज के मेले की विशेषता है कि श्रद्घालु आकर पहले गंगा स्नान करते हैैं। उसके बाद म्हाढ़ी पर प्रसाद या झंडी चढ़ाते हैं। यहां प्रसाद चढ़ाकर लगभग पांच किलोमीटर दूर नौलखा जाते हैं। नौलखा एक पुराना किला है। इसमें सैयद शुजात अली के मजार पर प्रसाद और झाड़ू चढ़ाते हैं। यहां मुर्गा भी चढ़ाया जाता है। काफी श्रद्घालु मजार पर प्रसाद चढ़ाने के बाद म्हाढ़ी पर आते हैँ। इस मौसम में सर्प का प्रकोप ज्यादा होता है। इसलिए भी भक्त बचाव के लिए इनकी माढ़ी पर प्रसाद चढ़ाने आते हैं। जात देने वाले बच्चे या व्यक्ति को खादी के मोटे पीले कपड़े पहनाए जाते हैं। जात देने वाले के हाथ में जाहरदीवान का झंड़ा होता है और गर्मी से उसे राहत देने के लिए परिवार के सदस्य पंखों से हवा करते चलते हैं।
बुजुर्गों के पास है किस्सों का पिटारा
गोगा जाहरवीर के बारे में बुजुर्गों के पास किस्सों का पिटारा है। लगभग 85 वर्षीय जहानाबाद निवासी रिटायर्ड अध्यापक मोहम्मद अब्दुल वासे कहते हैं कि उनके बुजुर्ग बताते थे कि बाबा गोरखनाथ ने पहली धूनी यहीं लगाई थी। जाहरदीवान का पहला पड़ाव भी यही स्थान था। मुगल शासक की बेगम को सर्प ने डस लिया था। इसका उपचार बाबा जाहरदीवान ने किया था। इससे खुश होकर मुगल शासक ने यह रियासत बाबा जाहरदीवान को उपहार में दे दी थी। आज भी लोग नौलखा बाग या किले पर प्रसाद चढ़ाने आते हैं।
गंज निवासी करीब 85 साल के राजेश्वर प्रसाद कौशिक कहते हैं कि जहारवीर गोगा की यात्रा का प्रथम पड़ाव जहानाबाद स्थित नौलखा बाग में था। इसीलिए श्रद्धालु यहां आते हैं। गंज निवासी लगभग 82 वर्षीय पूर्व फौजी सत्यपाल पाराशर भी यही बताते हैं। 90 वर्षीय गंज निवासी विमल शरण अग्रवाल का कहना है कि बचपन से ही वे इस मेले का आयोजन देख रहे हैं। लगभग 94 वर्षीय गंज निवासी सत्येंद्र शरण ने बताया कि 70 वर्ष पूर्व तक यातायात का साधन न होने से श्रद्धालु पैदल या बैलगाड़ी से प्रसाद चढ़ाने आते थे। पहले 12 महीने गंगा घाट पर ही बहती थी। अब स्नान के लिए दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
दूरदराज से भी आते हैं श्रद्धालु
गंज की म्हाढ़ी के पुजारी श्रवण कुमार उपाध्याय का कहना है कि यहां दिल्ली राजस्थान, उत्तरांचल पूरब आदि से बड़ी संख्या में श्रद्घालु आते हैं। यहां आकर परिवार बच्चे की कामना के लिए प्रसाद चढ़ाते हैं। संतान होने पर वे उसकी जात देने आते हैं। जात देने वाले बच्चे या बड़े घर पर पूजा-अर्चना कर पीले या सफेद कपड़े पहनकर चलते हैं। परिवार भी प्राय: ऐसे ही कपड़े पहनता है। इन कपड़ों पर हल्दी से हाथों के पंजे की छाप लगाई जाती है। जात देने वाले के हाथ में लाल रंग का कपड़ा लगी झंडी होती है। दूसरे हाथ में हवा करने वाला पंखा होता है। पंखा प्राय: परिवार के सभी सदस्य लिए होते हैं। ये एक-दूसरे और रास्ते में मिलने वालों को हवा करते चलते हैं। म्हाड़ी पर जात दी जाती है।
मजार पर चढ़ती है झाडू, मुर्गा और प्रसाद
मजार के फकीर नूर शाह का कहना है कि मजार पर झाडू, प्रसाद चढ़ाया जाता है। कुछ मुर्गा भी चढ़ाते हैं। मान्यता है कि झाड़ू चढ़ाने से शरीर पर कहीं मस्सा हो तो मजार की धूल लगाने से वह रात में ही गायब हो जाता है। पांच पीढ़ियों से यहां की व्यवस्था उनका परिवार ही देखता है।
मेले का उद्घाटन आज
बिजनौर। जाहरदीवान मेला 29 जुलाई से शुरू हो रहा है। मेला जिला पंचायत द्वारा लगाया जाता है। जिला पंचायत के अभियंता राजेश्वर प्रसाद के अनुसार, मेले का उद्घाटन शाम चार बजे होगा। मेले के जानकार गंज निवासी पत्रकार कौशल शर्मा के अनुुसार, मेले में प्रतिवर्ष चार से पांच लाख श्रद्घालु आते हैं। मेले में दूर से आने वाले ही रुकते हैं।