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इनहेलेशन थेरेपी से थमेगा अस्थमा

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बिजनौर। इनहेलेशन थेरेपी अस्थमा के इलाज का मुख्य आधार है। सांस के साथ लेने वाली दवाएं अस्थमा के इलाज या उनका प्रबंधन करने का अभिन्न अंग हैं। इससे सीधे फेफड़ों में दवाएं पहुंचती हैं। यह बात नगर के वरिष्ठ परामर्शदाता फिजीशियन एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल अग्रवाल ने कही।
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सोमवार को एक रेस्टोरेंट में कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि अस्थमा जैसी भयानक बीमारी को दूर करने के प्रति लोग जागरूक होने लगे हैं। 60 वर्ष पहले आई क्रांति ने लाखों लोगों को स्वतंत्र रूप से और आसानी से सांस लेने के काबिल बनाया। अस्थमा के मरीजों का आसानी से इलाज किया जा सकता है। बीमारी की जांच चिंताजनक विषय है। क्योंकि खांसी और सांस न आने के लक्षणों को अक्सर टीबी से जोड़ दिया जाता था, जो कि गलत है। उन्होंने सलाह दी है कि रोगी को प्रतिदिन सुबह-शाम कम से कम दो बार इनहेलर यानी पंप का इस्तेमाल करना चाहिए।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि जीवन की गुणवत्ता पर अस्थमा का प्रभाव उससे कहीं ज्यादा हैं। इस समय सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए इनहेलेशन ट्रीटमेंट के प्रति जागरूकता बढ़ाने, इनहेलशन के सुरक्षित और विश्वसनीय होने का आश्वासन देने तथा अस्थमा को नियंत्रित करने की आवश्यकता के साथ-साथ अस्थमा को पूर्ण रूप से समझने आदि की ज्यादा जरूरत है। डा. अग्रवाल ने कहा कि अस्थमा के इलाज के क्षेत्र में हुए नए-नए आविष्कार और विशेष दवाइयां मरीजों को उनकी मर्जी का इलाज मुहैया कराने में सक्षम साबित हो रहे हैं। उन्होंने सभी मरीजों को नियमित रूप से अपना इलाज करने की सलाह दी है।
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उधर, नगर के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. ताजीम आरिफ ने कहा कि वातावरण में में धूल और धुएं के छोटे-छोटे कण अस्थमा के मरीजों की संख्या बढ़ा रहे हैं। भारतवर्ष में करीब 15-20 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, जो लगभग पूरी जनसंख्या का 12 प्रतिशत हैं। बात अगर दुनियाभर की जाए तो पूरे विश्व में प्रतिवर्ष अस्थमा के कारण हर साल एक लाख 80 हजार मौत हो जाती है। डॉ. ताजीम आरिफ ने सभी को वातावरण के अनुसार ढलने के लिए प्रेरित किया।
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