औराई। अनंत चतुर्दशी से पहले ही पांव अपने गांव की ओर खिंचे चले आते हैं। मुंबई, बंगलुरू व दिल्ली की दुनियादारी को भुलाकर यहां के लोग राम की लीला में लीन होने चले आते हैं। मुकुट पूजन से भरत मिलाप तक लीला की ही लय में रमे रहते हैं। औराई के अमीरपट्टी और कैयरमऊ की रामलीला का रंग कुछ ऐसा ही है।
कैयरमऊ की रामलीला सात दशक से अनवरत जारी है। अमीरपट्टी और गिर्दबड़गांव में भी करीब 65 साल से रामलीला हो रही है। तीनों गांवों रामलीला में एक समानता यह है कि यहां के सभी स्वरूप गांव के लोग ही धारण करते हैं। रामलीला में योगदान करने वाले महानगरों में उच्च पदों पर आसीन लोग भी होते हैं। इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर और निजी कंपनियों में प्रबंधक के पद पर कार्यरत लोग मुंबई, दिल्ली, बंगलुरू की चकाचौंध और माया की दुनिया को भुलाकर गांव खिंचे आते हैं। यहां आकर कोई रावण को जीता है तो कोई हनुमान को, कोई कुंभकरण को तो कोई जनक को।
अमीरपट्टी में श्री स्वामी रामानंद मारुतिनंदन रामलीला समिति सदस्य ही स्वरूप बनते हैं। पितृ पक्ष में होने वाली अधिकांश रामलीलाओं का मुकुट पूजन अनंत चतुर्दशी को हो जाता है। इस बार 28 सितंबर को मुकुट पूजन हो गया। इन गांवों की रामलीला से प्रेरणा दूसरे गांवों में लीलाएं शुरू हो गई हैं। जहां जगह पितृपक्ष में रामलीला नहीं होती वहां का मुकुट पूजन नवरात्र प्रतिपदा को होता है।
इनसेट
रामलीला के दौरान छुट्टी घर लौट आते हैं लोग
ज्ञानपुर। कैयरमऊ निवासी अविनाश शुक्ला जम्मू कश्मीर में रेलवे में इंजीनियर हैं। ये रामलीला में रावण और बालि का स्वरूप धारण करते हैं। हर साल रामलीला की शुरुआत छुट्टी लेकर गांव आ जाते हैं। डॉ. अशोक प्रयागराज में चिकित्सक हैं। रामलीला में जनक, सुषैन वैद्य, केवट और सुतीक्ष्ण बनते हैं। ये भी रामलीला के दौरान सारे कामकाज त्यागकर गांव में ही रहते हैं।