परंपरागत हैंडनाटेड कालीनों की खासियत दिखाते निर्यातक जाबिर अंसारी। स्रोत- संवाद
भारत की परंपरागत हस्तशिल्प हैंडनाॅटेड गलीचों की मांग लगातार घटती जा रही है। देखा जाए तो कभी इन्हीं कालीनों की बदौलत भारत की पूरे विश्व में धाक होती थी।
मौजूदा समय में कालीन के विकल्प, उत्पादन में ज्यादा समय लगने और भारी कीमतों के चलते नाटेड कालीन की मांग लगातार घटती जा रही है। कई कालीन निर्यातकों का कहना है कि वैश्विक मंदी भी इसका एक कारण है। मांग घटने से भदोही, मिर्जापुर से परंपरागत कारीगर पलायन कर चुके हैं। कुछ घर पर ही रह कर दूसरे काम में लग गए हैं।
कालीन निर्यातक जाबिर अंसारी ने बताया कि हस्तनिर्मित कालीन का बाजार मौजूदा कुल 17000 करोड़ मे से तीन हजार करोड़ का रह गया है। जबकि 1990 के दशक में यह 80 प्रतिशत तक होती थी। हैंडनाटेड कालीन कलात्मक होते हैं। देखने में दूसरे कालीनों से कहीं ज्यादा सुंदर होते हैं। इनकी डिजाइन भी काफी महीन होती हैं। 1990 के दशक में नाॅटेड कालीन का उत्पादन बहुतायत मे होता था। एक कालीन बनाने में कम से कम 6 महीने लग जाते हैं। इसलिए इनकी कीमत अधिक होती है। जाबिर ने बताया कि भदोही और मिर्जापुर मे आज कालीन के सस्ते विकल्प हैंडटफ्टेड, हैंडलूम कालीन, दरियों का विकल्प है।
देखने में सुंदर तो ये होते ही है लेकिन हैंडनाटेड के मुकाबले ये कम टिकाऊ होते हैं। विदेशों में यंग जेनरेशन ने इसे यूज एंड थ्रो की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। जिससे सस्ते कालीनों की मांग भी बढ़़ गई और हैंडनाटेड कालीन के दिन लद गए। वर्ष 2000 से बुनकरों का पलायन शुरू हो गया। स्थिति यह है कि हैंडनाटेड कालीन का उत्पादन कराने के लिए लोगों को बिहार, बंगाल, गुजरात, झारखंड समेत प्रदेश के शाहजहांपुर, बदायूं इकाई बनानी पड़ रही है।