आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री-प्राइमरी बनाया जा रहा है। ताकि वहां नौनिहालों को पढ़ाकर स्कूल जाने से पहले उनके शिक्षा के आधार को मजबूत किया जा सके। इसके लिए केंद्रों को कहीं मॉडल के रूप में तैयार किया जा रहा हे तो कहीं सजा कर उसे बेहतरीन बनाने का प्रयास चल रहा है। इन्हीं केंद्रों से कुपोषित बच्चों को पोषित बनाने का भी काम होता है। इनपर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन जिले में विभागीय सुस्ती कहें या फिर जिम्मेदारों की अनदेखी। हाल तो यह है कि किसी केंद्र पर भूसा रखा है तो कहीं भवन जर्जर स्थिति में है। यह तब है जब सितंबर में पोषण माह मनाया जा रहा है।
केदारपुर के रघुनाथ सिंह, राजन गोंड़, मनोज कुमार का कहना है कि जहां बच्चों की सेहत का ध्यान रखा जाता है और शिक्षा दी जाती है, वहां आंगनबाड़ी केंद्र पर भूसा भरा हुआ है। कई बार शिकायत की गई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। वहीं डुड़वा कुकरौठी के रामबाबू गुप्ता, नन्हें मौर्य का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर है। वहां बच्चों को भेजने में डर लगता है। बच्चों को दूसरी जगह भेजा जाता है। यह जरूर है कि विभाग ने सभी परियोजनाओं से जर्जर केंद्रों की सूची मांगी है। लेकिन सब कागज पर ही अभी चल रहा है।
जिले के कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों की पड़ताल की गई तो केंद्रों की हकीकत सामने आई। पता चला कि कोरोना के कारण केंद्र बंद हुए लेकिन जब हालात सामान्य हुए तब भी इन जगहों पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और विभागीय अधिकारी गए ही नहीं। घर तक पोषाहार पहुंचाने की योजना पर बल देते हुए केवल इसीपर नजर रखी गई। नतीजा यह हुआ कि केंद्रों की स्थिति बदहाल हो
प्रभारी डीपीओमंजू वर्मा का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्रों में भूसा रखने की जानकारी नहीं है। यदि ऐसा कहीं है तो इसके बारे में जानकारी करके कार्रवाई की जाएगी। जर्जर केंद्रों के बारे में सूचना मांगी गई है।