पूर्वी यूपी से बिहार तक अंग्रेजों की नाक में दम कर देने वाले झूरी सिंह के स्मारक स्थल का शिलान्यास 34 साल पूर्व तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी सिंह ने किया, लेकिन आज तक स्मारक स्थल मुकम्मल नहीं हो सका।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक उदासीनता से क्रांतिकारियों का गांव आज भी उपेक्षित है।
1857 की क्रांति के महान योद्धा रहे अमर शहीद झूरी सिंह का जन्म भदोही के सुरियावां क्षेत्र के परऊपुर गांव में 21 अक्टूबर 1816 में हुआ था। यूरोपीय इतिहासकार जिन्हें जनक्रांति के नायक मानते हैं, उन्होंने जगदीशपुर (बिहार) निवासी क्रांतिकारी बाबू कुंवर से मुलाकात के बाद दुद्धी से लेकर रोहतास (बिहार) तक क्रांति का जो बिगुल फूंका उससे अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिल गईं। मिर्जापुर के ओझला नाला में इस देशभक्त को फांसी पर चढ़ा दिया गया। झूरी सिंह के परिवारीजन रामेश्वर सिंह बताते हैं कि 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने परऊपुर में शहीद स्मारक का शिलान्यास किया था, लेकिन आज तक स्मारक स्थल पूरी तरह नहीं बन सका है। ज्ञानपुर-दुर्गागंज मार्ग का नामकरण झूरी सिंह के नाम पर किया गया था, लेकिन लोक निर्माण विभाग की मनमानी के चलते सभी स्थानों पर लगे बोर्डों से झूरी सिंह का नाम हटा दिया गया।
इनसेट
नील की खेती के विरोध में फूंका बिगुल
ज्ञानपुर। यूरोपीय इतिहासकार जैक्सन के मुताबिक नील की खेती के विरोध में 10 जून 1857 को भदोही में क्रांति ने व्यापक रूप ले लिया था। क्रांति इतनी तेज हुई कि अंग्रेज सिपाही पहाड़ी की ओर भाग गए।
उपेक्षा करने का आरोप लगाया है।