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शिक्षकों की भारी कमी, कैसे बेहतर हो रिजल्ट

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विभूति नारायण राजकीय इंटर कॉलेज ज्ञानपुर। संवाद - फोटो : BHADOHI
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ज्ञानपुर। राजकीय माध्यमिक एवं इंटर कॉलेजों में शैक्षिक व्यवस्था में सुधार की कवायद धरातल पर फेल हो गई है। शिक्षकों और प्रवक्ताओं की कमी के कारण छात्र-छात्राओं को बेहतर शिक्षा नहीं मिल पा रही है। शायद यहीं वजह है कि इस बार के यूपी बोर्ड परीक्षा रिजल्ट में इंटरमीडिएट के टॉप-10 में मात्र एक छात्र का नाम आया। 40 फीसदी से ज्यादा शिक्षकों और 70 फीसदी प्रवक्ताओं के पद रिक्त चल रहे हैं।
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जिले के 183 माध्यमिक और इंटर कॉलेजों में 38 राजकीय, 25 वित्तपोषित और 120 वित्तविहीन शामिल हैं। इसमें करीब एक लाख छात्र-छात्राएं नौवीं से 12वीं तक की शिक्षा ग्रहण करते हैं। स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, स्कूलों की स्थिति में बदलाव के लिए तमाम बातेें की जाती हैं, लेकिन धरातल पर राजकीय स्कूलों की दशा काफी खराब है। 33 राजकीय माध्यमिक विद्यालय और पांच इंटर कॉलेज हैं। इसमें सहायक अध्यापकों के 304 पद सृजित हैं। 176 सहायक अध्यापक तैनात हैं जबकि 128 रिक्त हैं। प्रवक्ताओं की संख्या तो और भी खराब है। सृजित 69 पदों में मात्र 20 मौजूद हैं जबकि 49 रिक्त है। इसके सापेक्ष वित्तपोषित कॉलेजों की हालत कुछ ठीक है। वित्तपोषित के सामान्य 23 कॉलेजों में प्रवक्ता के 87 पद सृजित हैं, 70 मौजूद और 17 रिक्त है। सहायक अध्यापक के सृजित 231 पदों में 160 मौजूद और 71 रिक्त हैं। दो अल्पसंख्यक वित्तपोषित कॉलेज में 33 पदों में 25 ही तैनात हैं। शिक्षकों की कमी के कारण छात्र-छात्राओं को विषयवार शिक्षा देना कॉलेज प्रशासन के लिए चुनौती बनी रहती है। सालों से बनी शिक्षकों की कमी अब तक पूरी नहीं हो सकी। यही कारण है कि यूपी बोर्ड के आने वाले परीक्षा परिणाम में हर साल हाईस्कूल और इंटर कॉलेजों के टॉपटेन में एकाध छात्र ही अपनी छाप छोड़ पाते हैं। जिले के सबसे पुराने कॉलेजों में शामिल विभूति नारायण राजकीय इंटर कॉलेज की हालत काफी चिंताजनक है। यहां शिक्षकों और प्रवक्ताओं के 60 से अधिक पद सृजित हैं, लेकिन वर्तमान में 25 के ही करीब पढ़ा रहे हैं। बेहतर शिक्षा, अनुशासन संग अन्य व्यवस्थाओं के लिए कभी पूर्वांचल में अपनी छाप छोड़ने वाला यह कॉलेज आज शिक्षकों और प्रवक्ताओं की कमी से जूझ रहा है। एक दशक पूर्व यहां प्रवक्ताओं और शिक्षकों की अच्छी खासी संख्या रहती थी, लेकिन हर साल तीन से चार शिक्षक और प्रवक्ता सेवानिवृत्त हो गए। कुछ प्रवक्ताओं को राजकीय माध्यमिक स्कूलों में प्रधानाचार्य बनाकर भेज दिया गया। उनके स्थान पर दूसरी नियुक्ति न होने से समस्या बढ़ती गई।
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